सूचना का अधिकार: लोकतंत्र की रीढ़, धरातल पर मजबूत करने के लिए जरूरी कदम

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श्री वी. एम. ठक्कर ,उत्तराखंड

भारत में सूचना का अधिकार (RTI) कानून को लागू हुए करीब दो दशक हो चुके हैं। इस कानून ने आम नागरिक को सरकार से सवाल पूछने और जवाब पाने का कानूनी अधिकार दिया है। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ी है, बल्कि कई बड़े घोटालों का पर्दाफाश भी हुआ है। फिर भी, धरातल पर RTI के प्रभाव को मजबूत करने के लिए कई सुधारों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत कोई भी नागरिक किसी भी सरकारी विभाग से कामकाज, खर्च, नियुक्ति, या योजनाओं की जानकारी मांग सकता है। कानून के मुताबिक, विभाग के सार्वजनिक सूचना अधिकारी (PIO) को 30 दिनों के भीतर जवाब देना अनिवार्य है। कई मामलों में इस अधिकार ने भ्रष्टाचार पर नकेल कसने का काम किया है। आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला, राशन वितरण में गड़बड़ी और कई अन्य मामले RTI के जरिए उजागर हुए।

“पारदर्शिता और जवाबदेही का आधार”

संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ सूचना का अधिकार भी नागरिक का मौलिक अधिकार माना जाता है। जब जनता को समय पर सही जानकारी मिलती है, तो वह नीतियों और फैसलों पर सवाल उठा सकती है। यही लोकतंत्र की असली ताकत है।

“चुनौतियाँ और कमियां”

हालांकि, RTI के इस्तेमाल में कई समस्याएं सामने आती हैं। कई लोगों को कानून की जानकारी नहीं है, ऑनलाइन पोर्टल सभी राज्यों में उपलब्ध नहीं हैं, और समय पर जवाब न मिलने पर भी कार्रवाई अक्सर टल जाती है। राज्य और केंद्रीय सूचना आयोगों में मामलों का अंबार लगा हुआ है। साथ ही, RTI कार्यकर्ताओं की सुरक्षा भी गंभीर चिंता का विषय है — पिछले वर्षों में कई कार्यकर्ताओं पर हमले और हत्याएँ हो चुकी हैं।

“मजबूती के लिए जरूरी कदम”

विशेषज्ञों का मानना है कि RTI को धरातल पर मजबूत करने के लिए सबसे पहले जनता में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। ग्राम पंचायत से लेकर कॉलेजों तक RTI प्रशिक्षण कार्यक्रम और कार्यशालाएँ आयोजित की जानी चाहिए। सभी राज्यों में केंद्र के RTI ऑनलाइन पोर्टल जैसा डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल ऐप उपलब्ध कराया जाना चाहिए, जिससे आवेदन करना आसान हो।

साथ ही, PIO की जवाबदेही तय करने के लिए समयसीमा के उल्लंघन पर सख्त जुर्माना और अनुशासनात्मक कार्रवाई अनिवार्य की जानी चाहिए। धारा 4(1)(b) के तहत सरकारी विभागों को स्वतः अधिकतम जानकारी सार्वजनिक करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए, ताकि अनावश्यक RTI आवेदनों का बोझ घटे।

RTI कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्हिसल ब्लोअर संरक्षण कानून का प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है। धमकी मिलने पर तत्काल पुलिस सुरक्षा और शिकायत निवारण की व्यवस्था होनी चाहिए। वहीं, सूचना आयोगों की क्षमता बढ़ाने के लिए पर्याप्त स्टाफ और फंड उपलब्ध कराना भी अहम है।

“नागरिकों की भूमिका”

विशेषज्ञ मानते हैं कि कानून को जीवंत बनाए रखने के लिए नागरिकों का सजग और सक्रिय होना सबसे महत्वपूर्ण है। RTI सिर्फ शिकायत दर्ज करने का माध्यम नहीं, बल्कि सरकार को जवाबदेह बनाने का एक शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीका है।

सूचना का अधिकार भारतीय लोकतंत्र की पारदर्शिता और ईमानदारी का स्तंभ है। लेकिन यह स्तंभ तभी मजबूत रहेगा, जब जनता जागरूक होगी, अधिकारी जवाबदेह होंगे और कार्यकर्ताओं को सुरक्षा मिलेगी। समय आ गया है कि RTI को केवल एक कागजी अधिकार न मानकर, धरातल पर उसका असली लाभ हर नागरिक तक पहुँचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

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