भ्रष्टाचार पर पर्दा डालना अब नहीं चलेगा: धारा 179 के तहत सरकारी विभाग की ज़िम्मेदारी
लेखक – एड.गुलजीत सिंह छाबड़ा,अजमेर ।
भारत में पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतंत्र की नींव हैं। लेकिन जब कोई सरकारी विभाग आम जनता से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी देने से इनकार करता है, खासकर भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में, तो यह सिर्फ नैतिक अपराध नहीं, बल्कि क़ानूनी अपराध भी है। भारतीय दंड संहिता (BNS) की धारा 179 ऐसे ही मामलों को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है, जिसके तहत जानकारी न देना दंडनीय अपराध है।
धारा 179 क्या कहती है?
भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS) की धारा 179 के अनुसार:
“यदि कोई व्यक्ति, जिसे क़ानून के अनुसार किसी लोक सेवक द्वारा कोई जानकारी देने के लिए कहा गया है, और वह ऐसा करने से इनकार करता है – जबकि उसे जानकारी देना अनिवार्य है – तो वह दंडनीय अपराध करता है।”
अब यह प्रावधान न केवल व्यक्तियों, बल्कि सरकारी विभागों पर भी लागू होता है, जब वे जानबूझकर सूचना देने से बचते हैं।
उदाहरण: नगर निगम में भ्रष्टाचार और सूचना का इनकार
मान लीजिए, किसी नगर निगम में सार्वजनिक शौचालय निर्माण में भारी भ्रष्टाचार हुआ है। नगर निगम ने 10 लाख रुपये खर्च दिखाए, लेकिन मौके पर सिर्फ दो अधूरे शौचालय हैं। एक आरटीआई कार्यकर्ता ने नगर निगम से इस कार्य से जुड़े टेंडर, भुगतान रसीदें और ठेकेदार की जानकारी मांगी।
नगर निगम महीनों तक जवाब नहीं देता, फिर कहता है कि “रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।” जबकि वह जानकारी फाइलों में मौजूद है और लोक सेवकों को जानकारी देने की वैधानिक जिम्मेदारी है।
ऐसे में यह मामला धारा 179 के तहत आता है, क्योंकि:
सूचना मांगने वाला नागरिक क़ानूनी प्रक्रिया के तहत जानकारी मांग रहा है (जैसे आरटीआई या जांच एजेंसी के माध्यम से)।
लोक सेवक (नगर निगम अधिकारी) जानबूझकर जानकारी देने से इनकार कर रहे हैं।
इससे न्याय प्रक्रिया बाधित हो रही है और भ्रष्टाचार पर पर्दा डाला जा रहा है।
क़ानूनी परिणाम क्या होंगे?
धारा 179 के तहत, अगर कोई लोक सेवक या सरकारी विभाग:
जानकारी देने से इनकार करता है, या
जानकारी छिपाता है, या
गुमराह करता है,
तो उसे 6 महीने तक की कैद, 1,000 रुपये तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।
यह क़ानून अब सरकारी अधिकारियों को “कोई जवाब नहीं है” कहकर बच निकलने से रोकता है।
जनता क्या कर सकती है?
अगर आपको लगता है कि किसी विभाग ने जानकारी नहीं दी है, तो आप:
RTI (सूचना का अधिकार) के तहत अपील कर सकते हैं।
संबंधित जांच एजेंसी को शिकायत दे सकते हैं।
मीडिया या अदालत के माध्यम से दबाव बना सकते हैं।
भ्रष्टाचार तभी बढ़ता है जब सूचना छिपाई जाती है। BNS की धारा 179 अब इसे अपराध की श्रेणी में लाती है। सरकारी विभागों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे जनता को समय पर सही जानकारी दें। अगर वे ऐसा नहीं करते, तो उन्हें क़ानून के कठघरे में लाना अब संभव है।
अब सवाल पूछना ही नहीं, जवाब लेना भी आपका अधिकार है।
