
वर्षों से हादसों का दर्द झेल रहे एनएच-30 के 6 किलोमीटर घाट मार्ग पर 17 करोड़ की परियोजना शुरू; सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता संत शिवानंद द्विवेदी की लगातार आवाज ने सुरक्षा के सवाल को बनाया जनमुद्दा
रीवा/त्योंथर। सोहागी पहाड़ की पहचान लंबे समय से केवल विंध्य की प्राकृतिक खूबसूरती तक सीमित नहीं रही है। नेशनल हाईवे-30 का यह पहाड़ी हिस्सा वर्षों से उन परिवारों की पीड़ा का गवाह रहा है, जिन्होंने इस मार्ग पर हुए हादसों में अपने अपनों को खोया। घुमावदार सड़क, तीखे मोड़, ढलान और भारी वाहनों की आवाजाही के बीच लगातार सामने आती दुर्घटनाओं ने सोहागी घाट को सड़क सुरक्षा के सबसे गंभीर सवालों में ला खड़ा किया। अब करीब छह किलोमीटर लंबे इस संवेदनशील मार्ग के पुनर्निर्माण और चौड़ीकरण के लिए लगभग 17 करोड़ रुपये की परियोजना पर काम शुरू होना निश्चित रूप से राहत की खबर है, लेकिन इस पूरी कहानी के केंद्र में एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—जनसुरक्षा के सवाल को लगातार उठाने वाली सामाजिक आवाज।सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता संत शिवानंद द्विवेदी ने सोहागी पहाड़ की समस्या को महज सड़क की खराबी अथवा निर्माण कार्य का विषय मानने के बजाय इसे सीधे मानव जीवन के अधिकार और प्रशासनिक जवाबदेही से जोड़कर उठाया। उनका लगातार जोर इस बात पर रहा कि किसी सड़क की वास्तविक उपयोगिता उसकी लंबाई, लागत या निर्माण के दावों से नहीं, बल्कि उस पर सफर करने वाले नागरिक की सुरक्षा से तय होती है।
हादसों ने जो सवाल खड़े किए, उनके जवाब अब जमीन पर चाहिए
सोहागी पहाड़ पर हुए हादसों की फेहरिस्त छोटी नहीं है। 21 अक्टूबर 2022 का वह भयावह हादसा आज भी इस मार्ग की संवेदनशीलता की याद दिलाता है, जिसमें हैदराबाद से गोरखपुर जा रही बस दुर्घटना का शिकार हुई थी। इस घटना में 15 मजदूरों की मौत और 40 से अधिक लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद 1 फरवरी 2024 को ट्रक के खाई में गिरने की घटना और फिर 5 जून 2025 को सात लोगों की मौत वाले हादसे ने एक बार फिर सड़क सुरक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया।हर हादसे के बाद सवाल उठे। जांच की बातें हुईं। सड़क सुधार और सुरक्षा उपायों की चर्चा हुई। लेकिन असली सवाल यह रहा कि अगर सोहागी घाट इतना संवेदनशील है तो दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्थायी और प्रभावी व्यवस्था कब बनेगी?यही वह बिंदु है जहां संत शिवानंद द्विवेदी की भूमिका महज किसी शिकायतकर्ता की नहीं, बल्कि जनसुरक्षा के मुद्दे को लगातार जीवित रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता की दिखाई देती है।
17 करोड़ की परियोजना से उम्मीद, लेकिन असली कसौटी निर्माण की गुणवत्ता
अब लगभग 17 करोड़ रुपये की लागत से छह किलोमीटर के इस घाट मार्ग को पुनर्निर्मित और चौड़ा किए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई है। यह कदम सोहागी पहाड़ के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। बेहतर सड़क, सुरक्षित आवागमन और व्यवस्थित यातायात से न केवल दुर्घटनाओं की आशंका कम करने में मदद मिलेगी, बल्कि त्योंथर और रीवा के बीच आवागमन, व्यापार तथा स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को भी गति मिल सकती है।लेकिन यहां सबसे जरूरी सवाल यह है कि नई सड़क कितनी मजबूत और कितनी सुरक्षित बनेगी?क्योंकि सोहागी पहाड़ को सिर्फ चौड़ा कर देना पर्याप्त नहीं होगा। पहाड़ी मार्ग की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सड़क की डिजाइन, मोड़, ढलान, जल निकासी, सुरक्षा अवरोध, रिफ्लेक्टर, संकेतक और गति नियंत्रण जैसी व्यवस्थाओं को भी उतनी ही गंभीरता से लेना होगा।
सड़क सुधार के साथ पुराने खर्च का हिसाब भी जरूरी
सोहागी पहाड़ की मौजूदा परियोजना जहां भविष्य की सुरक्षा की उम्मीद जगाती है, वहीं अतीत भी जवाब मांगता है।हादसों के बाद समय-समय पर सड़क की मरम्मत, रखरखाव और सुरक्षा सुधार के लिए राशि खर्च की गई। ऐसे में यह जानना भी जरूरी है कि अब तक सड़क सुधार के नाम पर कितनी राशि स्वीकृत हुई, कितनी खर्च हुई, किस एजेंसी को काम मिला, क्या-क्या कार्य कराए गए और उन कार्यों का वास्तविक परिणाम क्या रहा?यदि लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हादसों का सिलसिला नहीं रुका, तो इस पूरे तंत्र की समीक्षा होना स्वाभाविक है।यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि सरकारी धन और नागरिक जीवन दोनों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उठाया जाना चाहिए।
संत शिवानंद द्विवेदी ने सवाल को सड़क से उठाकर जनअधिकार तक पहुंचाया
सोहागी पहाड़ के मुद्दे पर संत शिवानंद द्विवेदी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका यही रही कि उन्होंने इसे केवल सड़क निर्माण की मांग बनकर सीमित नहीं होने दिया। उनके सवाल का मूल केंद्र रहा—क्या आम नागरिक को सुरक्षित यात्रा का अधिकार नहीं है?जब किसी मार्ग पर बार-बार जान जाती है, तो केवल वाहन चालक की गलती बताकर पूरी जिम्मेदारी समाप्त नहीं की जा सकती। सड़क की संरचना, सुरक्षा प्रबंध, निगरानी, गति नियंत्रण और प्रशासनिक तैयारी—हर पहलू की समीक्षा आवश्यक हो जाती है।यही सोच इस मुद्दे को व्यापक बनाती है।
अब मशीनें चल रही हैं, निगाहें भी रहेंगी
17 करोड़ की परियोजना शुरू होना निश्चित रूप से सकारात्मक कदम है, लेकिन सोहागी पहाड़ के लोगों की उम्मीद अब केवल घोषणा से पूरी नहीं होगी। जनता देखना चाहेगी कि निर्माण समय पर, निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप और पूरी गुणवत्ता के साथ पूरा होता है या नहीं।क्योंकि घटिया निर्माण के बाद दोबारा मरम्मत पर पैसा खर्च करना विकास नहीं, व्यवस्था की विफलता होगी।सोहागी पहाड़ जैसे संवेदनशील मार्ग पर निर्माण की प्रत्येक परत भविष्य की सुरक्षा से जुड़ी है। इसलिए यहां गुणवत्ता की निगरानी सामान्य सड़क परियोजना की तरह नहीं, बल्कि जनजीवन से जुड़े संवेदनशील कार्य के रूप में होनी चाहिए।
अब लक्ष्य सिर्फ सड़क बनाना नहीं, हादसों का इतिहास बदलना होना चाहिए
सोहागी पहाड़ की कहानी को यदि सचमुच बदला जाना है तो इस परियोजना का लक्ष्य केवल छह किलोमीटर सड़क का चौड़ीकरण नहीं होना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए—हादसों के लिए बदनाम इस मार्ग को सुरक्षित मार्ग में बदलना।इसके लिए सड़क सुधार के साथ प्रभावी क्रैश बैरियर, रिफ्लेक्टर, चेतावनी संकेत, गति नियंत्रण, रात की निगरानी, भारी वाहनों की जांच और नियमित सुरक्षा ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं भी मजबूत करनी होंगी।संत शिवानंद द्विवेदी द्वारा लगातार उठाया गया यह सवाल अब और बड़ा हो चुका है। सवाल यह नहीं कि सड़क बनेगी या नहीं; सवाल यह है कि क्या सड़क बनने के बाद किसी मां को अपने बेटे की सड़क हादसे में मौत की खबर सुननी पड़ेगी? क्या किसी परिवार की जिंदगी एक खतरनाक मोड़ पर खत्म होगी?यही वह कसौटी है, जिस पर सोहागी पहाड़ का आने वाला विकास परखा जाएगा।17 करोड़ की सड़क परियोजना अगर गुणवत्ता और दूरदर्शिता के साथ पूरी होती है, तो यह केवल निर्माण कार्य नहीं होगा। यह उन परिवारों के लिए राहत होगी, जिन्होंने वर्षों तक इस घाट से गुजरते हुए डर के साथ सफर किया है।और इस पूरी लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है—
“सोहागी पहाड़ को सिर्फ चौड़ा मार्ग नहीं, सुरक्षित मार्ग बनाना होगा।”
विकास की असली तस्वीर तब बनेगी, जब सड़क पर दौड़ते वाहनों के साथ लोगों का भरोसा भी सुरक्षित होगा।
