प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिट-सी संख्या 547/2024 में सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता द्वारा दायर बार-बार के आरटीआई आवेदनों और कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं करने पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की अदालत ने 5 अगस्त 2026 को आदेश जारी करते हुए याचिका खारिज कर दी और याचिकाकर्ता पर कुल 6 लाख 70 हजार रुपये का खर्च लगाया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधित मामले में मांगी गई आवश्यक सूचनाएं पहले ही उपलब्ध कराई जा चुकी थीं। इसलिए राज्य सूचना आयोग के 28 जुलाई 2023 के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।
कोर्ट में व्यक्तिगत पेशी के आदेश के बावजूद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेशी
मामले में कोर्ट ने पहले याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर मामले की सुनवाई में सहयोग करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद 5 अगस्त को याचिकाकर्ता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हुआ।
कोर्ट ने कहा कि जब अदालत व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश देती है तो उसका पालन किया जाना चाहिए। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होना किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह अदालत की सुविधा और विवेक पर निर्भर माध्यम है।
याचिकाकर्ता ने लगभग 2,000 किलोमीटर की यात्रा और लॉजिस्टिक समस्या का हवाला देकर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि उसे राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की मदद लेने तथा सुविधानुसार निश्चित तारीख और समय पर उपस्थित होने का विकल्प बताया गया था, फिर भी उसने व्यक्तिगत उपस्थिति से बचने पर जोर दिया।
24 आरटीआई आवेदन दाखिल करने पर कोर्ट की नाराजगी
कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद डिप्टी रजिस्ट्रार (आरटीआई) की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने 4 जून 2026 से 17 जुलाई 2026 के बीच 24 आरटीआई आवेदन दाखिल किए थे।
इन आवेदनों में कोर्ट की आंतरिक प्रशासनिक फाइलों, नोटशीट, रूटिंग शीट, कोर्ट की उपस्थिति संबंधी रिकॉर्ड, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के तकनीकी लॉग, सर्वर लॉग, फाइल मूवमेंट रिकॉर्ड और कोर्ट की कार्यवाही से संबंधित विभिन्न प्रशासनिक जानकारियां मांगी गई थीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की सूचनाओं के लिए आरटीआई आवेदन दाखिल करने से अदालत के कर्मचारियों का समय खर्च होता है और न्याय प्रशासन में बाधा उत्पन्न होती है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता के पास आरटीआई आवेदन दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय था, लेकिन मामले के गुण-दोष पर बहस करने के लिए अदालत में उपस्थित होने पर वह जोर नहीं दे रहा था।
24 आरटीआई आवेदनों पर ₹1.20 लाख का खर्च
कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता आरटीआई कानून के प्रावधानों का दुरुपयोग कर रहा था। इसलिए उसके द्वारा दाखिल सभी संबंधित आरटीआई आवेदनों को रिकॉर्ड में रखने का निर्देश दिया गया और 24 आरटीआई आवेदनों पर प्रत्येक के लिए ₹5,000, यानी कुल ₹1.20 लाख का खर्च लगाया गया।
गलत दावे वाली अर्जी पर ₹50 हजार की लागत
याचिकाकर्ता ने एक आवेदन दाखिल कर प्रतिवादियों को कथित रूप से काउंटर एफिडेविट दाखिल नहीं करने के लिए दंडित करने की मांग की थी।
कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि प्रतिवादी संख्या-2 की ओर से काउंटर एफिडेविट पहले ही दाखिल किया जा चुका था और उसकी प्रति याचिकाकर्ता के वकील को उपलब्ध कराई गई थी। साथ ही प्रतिवादी संख्या 1, 3 और 4 को अलग से एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश नहीं दिया गया था।
कोर्ट ने इस आवेदन को रिकॉर्ड के विपरीत और गलत तथ्यों पर आधारित बताते हुए खारिज कर दिया तथा ₹50,000 की लागत लगाई।
कोर्ट ने कहा—मांगी गई सूचना पहले ही दी जा चुकी थी
मूल मामले में याचिकाकर्ता ने कुछ शिकायतों और पुलिस/साइबर सेल से संबंधित जानकारी मांगी थी। कोर्ट ने रिकॉर्ड में उपलब्ध जवाबों की जांच की।
कोर्ट के अनुसार, मांगी गई सूचनाओं के संबंध में संबंधित अधिकारियों की ओर से जवाब पहले ही उपलब्ध कराया जा चुका था। कुछ बिंदुओं पर यह बताया गया था कि संबंधित सूचना संबंधित कार्यालय से जुड़ी है, जबकि कुछ रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई थी।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यदि मांगी गई आवश्यक सूचना संबंधित प्राधिकरण द्वारा पहले ही उपलब्ध करा दी गई है, तो याचिकाकर्ता ऐसी सूचना देने की जिद नहीं कर सकता जो संबंधित अधिकारियों के पास उपलब्ध ही नहीं है।
याचिका ही खारिज, ऊपर से ₹5 लाख की अतिरिक्त लागत
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सूचना आयोग के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है। इसलिए रिट याचिका खारिज कर दी गई।
कोर्ट ने न्यायिक कार्यवाही और न्याय प्रशासन में व्यवधान रोकने के उद्देश्य से याचिकाकर्ता पर अतिरिक्त ₹5 लाख की लागत भी लगाई।
कुल ₹6.70 लाख चार सप्ताह में जमा करने का आदेश
अदालत ने तीन अलग-अलग मदों में लगाई गई लागत को जोड़ते हुए कुल राशि तय की—
- ₹50,000 — गलत तथ्यों पर आधारित आवेदन के लिए
- ₹1,20,000 — 24 आरटीआई आवेदनों के लिए
- ₹5,00,000 — न्यायिक कार्यवाही एवं न्याय प्रशासन में व्यवधान को हतोत्साहित करने के लिए
इस तरह कुल ₹6,70,000 की राशि याचिकाकर्ता को चार सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट लीगल सर्विस कमेटी के बैंक खाते में जमा करनी होगी। राशि जमा नहीं करने की स्थिति में रजिस्ट्रार जनरल को उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
कोर्ट के आदेश का सार
इस आदेश का मुख्य संदेश यह है कि आरटीआई कानून के तहत सूचना मांगना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन कोर्ट ने इस मामले में बार-बार ऐसे आवेदन दाखिल करने, न्यायिक प्रशासन से जुड़ी विस्तृत आंतरिक सूचनाएं मांगने और अदालत द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश के बावजूद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर जोर देने को गंभीरता से लिया।
साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होना किसी पक्षकार का मौलिक अधिकार नहीं है; यह अदालत की अनुमति और सुविधा पर निर्भर है।
