अजमेर नगर निगम चुनाव में सियासी संग्राम तेज

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देवनानी बनाम गहलोत की सियासी परीक्षा! टिकट से पहले बगावत के संकेत, वार्ड-4 बना सबसे बड़ा अखाड़ा; नामांकन के आखिरी दौर में बदल रहे समीकरण

अजमेर, 30 अगस्त।
अजमेर नगर निगम चुनाव-2026 अब केवल वार्डों की लड़ाई नहीं रह गया है। टिकटों की घोषणा से पहले ही शहर की सियासत में घमासान शुरू हो चुका है। भाजपा और कांग्रेस की अधिकृत सूची सामने आने से पहले ही दावेदारों ने नामांकन दाखिल कर अपनी राजनीतिक जमीन सुरक्षित करने की कोशिश शुरू कर दी है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में अजमेर उत्तर की राजनीति, विधानसभा अध्यक्ष एवं अजमेर उत्तर विधायक वासुदेव देवनानी और भाजपा के पूर्व महापौर धर्मेंद्र गहलोत के बीच उभरता सियासी संघर्ष दिखाई दे रहा है।

वार्ड-4 बना प्रतिष्ठा का प्रश्न

अजमेर उत्तर के वार्ड नंबर 4 का आरक्षण इस चुनाव में बड़ा राजनीतिक मोड़ साबित हुआ है। यह वार्ड ओबीसी महिला के लिए आरक्षित है। इसी वार्ड से पूर्व महापौर धर्मेंद्र गहलोत की पत्नी हेमा गहलोत ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल किया है।

हेमा गहलोत के नामांकन के साथ ही वार्ड-4 सामान्य चुनावी मुकाबले से निकलकर भाजपा के भीतर की राजनीति का केंद्र बन गया है। धर्मेंद्र गहलोत लंबे समय से अजमेर की भाजपा राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं और दो बार अजमेर के महापौर रह चुके हैं। ऐसे में उनकी पत्नी का निर्दलीय मैदान में उतरना भाजपा के लिए स्थानीय स्तर पर गंभीर राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।

गहलोत का देवनानी पर निशाना

नामांकन के बाद धर्मेंद्र गहलोत ने टिकट वितरण को लेकर गंभीर आरोप लगाए और एक पेनड्राइव में कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग होने का दावा करते हुए मामले की जांच की मांग की। रिपोर्टों में उनके आरोपों का उल्लेख है, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्ष का पक्ष भी सामने आना बाकी है।

यही घटनाक्रम अब अजमेर भाजपा के भीतर चल रही टिकट की खींचतान को सार्वजनिक राजनीतिक बहस में ले आया है। सवाल यह है कि पार्टी नेतृत्व बगावत के संभावित खतरे को किस तरह संभालता है और टिकट वितरण के बाद कितने दावेदार पार्टी के फैसले के साथ खड़े रहते हैं।

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देवनानी के लिए भी अग्निपरीक्षा

अजमेर उत्तर विधायक और राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी के लिए नगर निगम चुनाव को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र के कई वार्डों में भाजपा का प्रदर्शन उनके स्थानीय राजनीतिक प्रभाव की कसौटी माना जाएगा। खासकर वार्ड-4 का घटनाक्रम पार्टी संगठन और स्थानीय नेतृत्व के बीच तालमेल की परीक्षा बन गया है।

आरक्षण ने पहले ही पुराने राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। वार्ड-4 के ओबीसी महिला के लिए आरक्षित होने से देवनानी का पुराना वार्ड सीधे चुनावी मैदान में उनके लिए उपलब्ध नहीं रहा, जबकि पूर्व महापौर धर्मेंद्र गहलोत का वार्ड-2 अनारक्षित है।

कांग्रेस भी टिकट के इंतजार में, दावेदारों ने भरे पर्चे

दूसरी ओर कांग्रेस में भी टिकट के दावेदारों की सक्रियता तेज है। उपलब्ध नामांकन विवरण के अनुसार वार्ड-12 से संगीता, वार्ड-13 से खुशनूर खानम, वार्ड-14 से वाहिद मोहम्मद, वार्ड-30 से बालकिशन शर्मा, वार्ड-39 से सरजू देवी, वार्ड-43 से काजल यादव और वार्ड-47 से तरुणा सहित कई दावेदारों ने नामांकन दाखिल किया है।

हालांकि, इन नामांकनों को अंतिम पार्टी प्रत्याशी मानना अभी जल्दबाजी होगी। भाजपा और कांग्रेस दोनों की अधिकृत सूचियां पूरी तरह सामने नहीं आई हैं। टिकट कटने की स्थिति में यही दावेदार निर्दलीय मैदान में उतरते हैं या पार्टी के साथ बने रहते हैं—यह चुनाव का अगला बड़ा सवाल होगा।

29 अगस्त को 25 नामांकन जमा

निर्वाचन संबंधी उपलब्ध जानकारी के अनुसार 29 अगस्त को वार्ड 1 से 20 के लिए 163 नामांकन फार्म वितरित हुए और 9 जमा हुए। वार्ड 21 से 40 में 100 फार्म वितरित हुए और 10 जमा हुए। वार्ड 41 से 60 में 110 तथा वार्ड 61 से 80 में 122 फार्म वितरित किए गए। उपलब्ध विवरण में कुल 25 नामांकन जमा होने की जानकारी सामने आई है।

ज्ञान सारस्वत के यू-टर्न ने भी बढ़ाई हलचल

भाजपा के पूर्व पार्षद ज्ञान सारस्वत द्वारा स्वयं और अपने परिवार के किसी सदस्य के चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा ने भी अजमेर उत्तर के राजनीतिक समीकरणों में चर्चा पैदा कर दी है। टिकट वितरण से पहले यह घटनाक्रम भाजपा की आंतरिक रणनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अब 31 अगस्त पर निगाह

नामांकन की अंतिम तारीख 31 अगस्त है। इसके बाद 1 सितंबर को नामांकन पत्रों की जांच और 3 सितंबर को नाम वापसी की प्रक्रिया के बाद चुनावी मैदान की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी। इसलिए फिलहाल जो नामांकन दिखाई दे रहे हैं, उन्हें अंतिम उम्मीदवार सूची मानना सही नहीं होगा।

अजमेर की चुनावी जंग में फिलहाल असली मुकाबला दो स्तरों पर है—एक तरफ भाजपा बनाम कांग्रेस और दूसरी तरफ दोनों दलों के भीतर टिकट की लड़ाई। वार्ड-4 में धर्मेंद्र गहलोत परिवार की स्वतंत्र चुनौती ने इस संघर्ष को और धार दे दी है। अब सवाल केवल यह नहीं कि नगर निगम में किसका बोर्ड बनेगा, बल्कि यह भी है कि टिकट वितरण के बाद कौन पार्टी के साथ रहेगा और कौन बागी होकर चुनावी मैदान में उतरेगा।

अजमेर की सियासत में 31 अगस्त का दिन इसलिए बेहद अहम माना जा रहा है—क्योंकि इसी दिन कई दावेदारों के राजनीतिक भविष्य और कई नेताओं की संगठनात्मक पकड़ की असली परीक्षा होगी।

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