
₹50 हजार खर्च कराने के बाद बिगड़ी हालत तो किया रेफर, संजय गांधी अस्पताल पहुंचने तक मासूम की जिंदगी हार गई जंग परिजनों का गंभीर आरोप—समय पर मिलता सही इलाज और ऑक्सीजन तो बच सकती थी बच्चे की जान, निजी अस्पताल की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
रीवा। विंध्य की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर कटघरे में है। सवाल सिर्फ एक मासूम की मौत का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जहां गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चे की सांसें बचाने के लिए अस्पतालों की चौखट पर उम्मीद लेकर पहुंचते हैं और कई बार बदले में उन्हें मिलता है—भारी-भरकम बिल, लंबा इलाज और आखिर में गंभीर हालत में रेफर की पर्ची।रीवा जिले में एक मासूम की मौत के बाद परिजनों ने इलाज की पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। परिवार का आरोप है कि बच्चे को रीवा के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज, दवाइयों और अन्य खर्चों के नाम पर करीब 50 हजार रुपये खर्च हो गए। परिजनों का कहना है कि इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बावजूद बच्चे की हालत में सुधार नहीं हुआ और जब स्थिति ज्यादा गंभीर हो गई तो उसे संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय रेफर कर दिया गया।लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।परिवार मासूम को लेकर संजय गांधी अस्पताल पहुंचा, जहां चिकित्सकों ने उपचार का प्रयास किया, लेकिन बच्चे की जिंदगी नहीं बचाई जा सकी। मासूम की मौत के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। रोते-बिलखते परिजन अब सिर्फ अपने बच्चे को नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को सवालों के कटघरे में खड़ा कर रहे हैं।
“समय पर ऑक्सीजन और सही इलाज मिलता तो शायद बच जाती जान”
परिजनों का सबसे गंभीर आरोप यह है कि यदि बच्चे की हालत को समय रहते गंभीरता से लिया जाता, उसे आवश्यक उपचार और ऑक्सीजन उपलब्ध कराई जाती तथा जरूरत पड़ने पर पहले ही बड़े चिकित्सा केंद्र रेफर किया जाता, तो शायद आज उनका मासूम जिंदा होता।यह आरोप केवल एक परिवार का दर्द नहीं है, बल्कि रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ा एक बड़ा और कड़वा सवाल है। जब मरीज की हालत लगातार बिगड़ रही थी, तो उसे समय रहते रेफर क्यों नहीं किया गया?इलाज के नाम पर हजारों रुपये खर्च कराने के बाद आखिर मरीज को सरकारी अस्पताल भेजने की नौबत क्यों आई?क्या निजी अस्पतालों में गंभीर मरीजों के इलाज और रेफरल की व्यवस्था की नियमित निगरानी होती है? इन सवालों के जवाब अब केवल पीड़ित परिवार नहीं, बल्कि पूरा समाज जानना चाहता है।
₹50 हजार खर्च के बाद रेफर, आखिर जिम्मेदार कौन?
मासूम की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इलाज के दौरान बच्चे की वास्तविक स्थिति क्या थी और निजी अस्पताल द्वारा किस स्तर तक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। परिजनों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, इलाज से जुड़े रिकॉर्ड की समीक्षा करने और यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की है।रीवा में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर पहले भी प्रसूताओं, नवजातों और गंभीर मरीजों की मौत के मामलों में सवाल उठते रहे हैं। हर घटना के बाद जांच की बात होती है, जिम्मेदारी तय करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जब तक व्यवस्था में वास्तविक सुधार नहीं होता, तब तक किसी न किसी परिवार की जिंदगी उजड़ने का सिलसिला आखिर कब तक चलता रहेगा?
जिंदगी पहले या बिल?
यह मामला एक बेहद गंभीर बहस खड़ी करता है——अस्पताल का पहला उद्देश्य मरीज की जान बचाना है या इलाज के नाम पर खर्च बढ़ाते जाना?एक परिवार अपने बच्चे को बचाने के लिए करीब 50 हजार रुपये खर्च करता है। उम्मीद करता है कि अस्पताल में इलाज हो रहा है, सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन जब हालत बिगड़ती है तो रेफर कर दिया जाता है। इसके बाद सरकारी अस्पताल पहुंचने तक जिंदगी की डोर कमजोर पड़ चुकी होती है।हालांकि, इस मामले में निजी अस्पताल प्रबंधन का पक्ष और स्वास्थ्य विभाग की आधिकारिक जांच रिपोर्ट सामने आना अभी बाकी है।इसलिए उपचार में लापरवाही और खर्च से जुड़े आरोप फिलहाल परिजनों के आरोप हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। लेकिन एक बात तय है—एक मासूम की मौत ने रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था को फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है।
आखिर कब तक?
कब तक प्रसूताएं इलाज के लिए अस्पतालों के चक्कर लगाती रहेंगी?कब तक नवजात और मासूम इलाज की कमी या कथित लापरवाही के आरोपों के बीच दम तोड़ते रहेंगे?कब तक जांच के आदेशों और कार्रवाई के आश्वासनों से परिवारों का दर्द दबाया जाएगा?
स्वास्थ्य विभाग को अब जवाब देना होगा।
क्योंकि यहां सवाल सिर्फ एक अस्पताल, एक डॉक्टर या एक मासूम की मौत का नहीं है—सवाल उस व्यवस्था का है, जिस पर लोग अपनी जिंदगी और अपने बच्चों की सांसें भरोसे छोड़कर आते हैं।और सवाल आज भी वही है—रीवा में इलाज हो रहा है या इलाज के नाम पर धंधा?
