विष्णुकांत कुशवाहा ने कहा—इतना महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है तो जिला मुख्यालय में लगाइए; जल सत्याग्रह के बीच जितेन्द्र ने जादूगोड़ा का उदाहरण देकर उठाए सवाल
रीवा/लालगांव/सरई,रोझौही। रीवा जिले के सिरमौर क्षेत्र के रोझौही में प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर जारी विरोध के बीच आंदोलन ने नया मोड़ ले लिया है। जल सत्याग्रह के साथ आम आदमी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता प्रमोद शर्मा ने अन्न त्याग कर आमरण अनशन शुरू कर दिया है। वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता एवं बसपा जिला अध्यक्ष विष्णुकांत कुशवाहा ने प्रस्तावित परियोजना की स्थापना पर सवाल उठाते हुए इसे जिला मुख्यालय में स्थापित करने का सुझाव दिया। आंदोलन के दौरान जितेन्द्र ने भी झारखंड के जादूगोड़ा का उदाहरण देते हुए जनता तक सही जानकारी पहुंचाने को महत्वपूर्ण बताया।धरना स्थल पर लालगांव प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की टीम पहुंची और प्रमोद शर्मा का मेडिकल चेकअप किया। इस घटनाक्रम के बीच परियोजना को लेकर उठ रही स्थानीय चिंताएं और आंदोलनकारियों के बयान चर्चा के केंद्र में हैं।
‘इतना महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है तो जिला मुख्यालय में लगाइए’
सामाजिक कार्यकर्ता एवं बसपा जिला अध्यक्ष विष्णुकांत कुशवाहा ने प्रस्तावित परियोजना का विरोध करते हुए स्वास्थ्य, बिजली के बुनियादी ढांचे और विकास के लाभों से जुड़े सवाल उठाए। उन्होंने अपने बयान में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की आशंका व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसी परियोजना यहां स्थापित नहीं की जानी चाहिए।कुशवाहा ने तर्क दिया कि यदि परियोजना इतनी महत्वपूर्ण है और इससे बड़े स्तर पर लाभ मिलने की बात कही जा रही है, तो इसे जिला मुख्यालय में स्थापित करने पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि जिले को इसका लाभ मिल सके। उन्होंने बिजली पहुंचाने के लिए तार बिछाने की जरूरत का उल्लेख करते हुए कहा कि जिला मुख्यालय में ही संयंत्र स्थापित करने से तार बिछाने पर होने वाले खर्च में बचत हो सकती है।उनके बयान ने बहस को एक अहम सवाल की ओर मोड़ा है—यदि किसी परियोजना को जिले के विकास से जोड़कर देखा जा रहा है, तो उसके लाभ, संभावित प्रभाव और बुनियादी सुविधाओं की लागत का आकलन किस आधार पर किया जा रहा है?हालांकि, कैंसर या अन्य बीमारियों के संभावित खतरे का निष्कर्ष केवल आशंका के आधार पर नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए परियोजना के वास्तविक स्वरूप, विकिरण सुरक्षा व्यवस्था, पर्यावरणीय आकलन और वैज्ञानिक प्रमाणों की जांच आवश्यक है।
‘नाम महत्वपूर्ण नहीं, जनता के सामने रखी जा रही जानकारी महत्वपूर्ण है’

उनके वक्तव्य का मुख्य जोर इस बात पर रहा कि किसी बड़ी परियोजना पर विचार करते समय जनता तक पहुंचने वाली जानकारी, स्थानीय अनुभव और सुरक्षा से जुड़े सवालों को गंभीरता से समझा जाना चाहिए।जादूगोड़ा यूरेनियम खनन के लिए जाना जाता है। हालांकि, वहां की खनन गतिविधियों और रोझौही में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र की प्रकृति अलग है। इसलिए किसी एक स्थान के अनुभवों को दूसरे स्थान पर सीधे लागू करने के बजाय संबंधित वैज्ञानिक अध्ययनों, पर्यावरणीय रिपोर्टों और सुरक्षा मानकों के आधार पर निष्कर्ष निकालना आवश्यक है।
आमरण अनशन से बढ़ी प्रशासन की जिम्मेदारी
प्रमोद शर्मा द्वारा जल सत्याग्रह के साथ अन्न त्याग कर आमरण अनशन शुरू करना आंदोलन का महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। धरना स्थल पर स्वास्थ्य विभाग की टीम का पहुंचना भी इस घटनाक्रम का हिस्सा रहा।अब प्रशासन के सामने ग्रामीणों की चिंताओं को सुनने, परियोजना की स्थिति और प्रस्तावित गतिविधियों पर स्पष्ट जानकारी देने तथा संबंधित पक्षों के साथ संवाद स्थापित करने की चुनौती है।रोझौही का सवाल केवल यह नहीं है कि परियोजना स्थापित होगी या नहीं। सवाल यह भी है कि स्थानीय लोगों की आशंकाओं का जवाब कौन देगा, सुरक्षा संबंधी तथ्यों को सार्वजनिक कैसे किया जाएगा और विकास से जुड़े निर्णयों में प्रभावित समुदाय की भागीदारी किस तरह सुनिश्चित होगी।फिलहाल, जल सत्याग्रह, आमरण अनशन और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बयानों ने प्रस्तावित परियोजना को लेकर चल रही बहस को नया आयाम दिया है। अब निगाहें प्रशासन की अगली पहल और आंदोलनकारियों की मांगों पर होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं।

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