खर्च की प्रक्रिया में ऐतिहासिक बदलाव: अब नहीं चलेगा फर्जीवाड़ा
अजमेर/जयपुर। राजस्थान में ग्रामीण राजनीति का पारा चढ़ चुका है। एक तरफ जहां प्रदेश भर में ग्राम पंचायत चुनावों को लेकर सरगर्मियां तेज हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार और निर्वाचन आयोग द्वारा सरपंचों की वित्तीय शक्तियों, खर्च की व्यवस्था और पात्रता नियमों में किए गए बड़े बदलावों ने चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है।
पंचायत चुनाव 2026: क्या है ताजा चुनावी अपडेट?
हाईकोर्ट का कड़ा रुख और 15 नवंबर की डेडलाइन: हाईकोर्ट ने प्रदेश में पंचायत चुनाव प्रक्रिया को 15 नवंबर तक हर हाल में संपन्न कराने के कड़े निर्देश दिए हैं। राज्य सरकार व राज्य निर्वाचन आयोग अब नवंबर के पहले और दूसरे सप्ताह में चरणबद्ध मतदान कराने की तैयारी में जुटे हैं।
आरक्षण लॉटरी से बदला चौपालों का गणित: जिला परिषद, पंचायत समिति और सरपंच पदों के लिए आरक्षण लॉटरी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कई दिग्गज नेताओं की परंपरागत सीटें आरक्षित वर्ग या महिला कोटे में चली गई हैं। इससे कई पुराने दावेदार दौड़ से बाहर हो गए हैं और नए चेहरों की दावेदारी सामने आ रही है।
किसी भी वक्त लग सकती है आचार संहिता: निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों, मतदान केंद्रों और ईवीएम के रेंडमाइजेशन की गाइडलाइन जारी की जा चुकी है। आयोग की अंतिम अधिसूचना और आचार संहिता की घोषणा अब किसी भी दिन संभव है।
वोटिंग का तरीका: जिला परिषद एवं पंचायत समिति सदस्यों के चुनाव ईवीएम (EVM) के जरिए कराए जाएंगे, जबकि सरपंच और वार्ड पंच पदों के लिए मतदान मतपत्र (बैलट पेपर) के जरिए संपन्न होने का प्रस्ताव है।
सरपंच चुनाव: पात्रता और नियमों में क्या राहत?
संतान संबंधी नियम में बड़ी ढील: पूर्व में लागू ‘दो से अधिक संतान’ पर चुनाव लड़ने की अयोग्यता वाले कड़े नियम में संशोधनों के जरिए उम्मीदवारों को बड़ी राहत मिली है।
शैक्षणिक योग्यता की बाध्यता खत्म: राजस्थान में सरपंच पद के लिए 8वीं या 10वीं पास होने की पुरानी अनिवार्य शर्त अब लागू नहीं है। कोई भी साक्षर नागरिक चुनाव लड़ सकता है।
सक्रिय शौचालय अनिवार्य: प्रत्याशी के घर में नियमित उपयोग वाला क्रियाशील शौचालय होना अनिवार्य है और परिवार का कोई सदस्य खुले में शौच न जाता हो।
बकायादारी से मुक्ति: उम्मीदवार किसी भी सहकारी बैंक, विद्युत निगम या ग्राम पंचायत का बकाएदार (डिफॉल्टर) नहीं होना चाहिए।
खर्च की प्रक्रिया में ऐतिहासिक बदलाव: अब नहीं चलेगा फर्जीवाड़ा
अब सरपंच या ग्राम विकास अधिकारी (VDO) अपनी मनमर्जी से पंचायत के खाते से एक भी रुपया नकद नहीं निकाल सकते। बजट खर्च की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और डिजिटल बना दिया गया है:
ग्राम सभा का अनुमोदन जरूरी: किसी भी नाली, सड़क, सामुदायिक भवन या लाइट के काम का प्रस्ताव पहले ग्राम सभा और पंचायत बैठक में पारित होना अनिवार्य है।
तकनीकी स्वीकृति व जियो-टैगिंग: कनिष्ठ अभियंता (JEN) द्वारा मौके का निरीक्षण कर एस्टीमेट बनता है। काम शुरू होने से पहले, काम के दौरान और पूरा होने के बाद की वास्तविक तस्वीरें जियो-टैग (Geo-tag) कर पोर्टल पर अपलोड करनी होती हैं।
PFMS और e-GramSwaraj से सीधा ट्रांसफर: माप पुस्तिका (MB) भरने के बाद बिल ऑनलाइन दर्ज होते हैं। भुगतान केवल PFMS और e-GramSwaraj पोर्टल के माध्यम से वेंडर/ठेकेदार के बैंक खाते में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) से होता है।
दोनों के डिजिटल सिग्नेचर (DSC) अनिवार्य: भुगतान तभी पास होगा जब सरपंच और ग्राम विकास अधिकारी दोनों अपने-अपने डोंगल (डिजिटल सिग्नेचर) से ऑनलाइन मंजूरी देंगे।
बदलाव के मुख्य कारण: क्यों कसी गई नकेल?
फर्जी बिल और नकद निकासी पर पूर्ण रोक: पहले पंचायतों में चेक काटकर नकद निकालने और फर्जी वाउचर लगाकर लाखों का गबन करने के मामले आम थे। ऑनलाइन DBT व्यवस्था ने इसे जड़ से समाप्त कर दिया है।
धरातल पर काम का सत्यापन: पहले बिना काम हुए कागजों में विकास दिखाकर बजट हड़पने की शिकायतें आती थीं। अब सैटेलाइट और जियो-टैगिंग के कारण वास्तविक काम दिखाए बिना एक बिल भी पास नहीं हो सकता।
आम जनता के हाथ में निगरानी: ई-ग्रामस्वराज पोर्टल पर पंचायत को मिले कुल फंड और किए गए खर्च का ब्योरा सार्वजनिक रहता है, जिससे कोई भी ग्रामीण अपने गांव के विकास की सोशल ऑडिट कर सकता है।
जवाबदेही तय: डिजिटल रिकॉर्ड होने से गड़बड़ी मिलने पर सरपंच और ब्लॉक स्तर के अधिकारी सीधे जांच के दायरे में आते हैं और जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
