8₹ अन्नपूर्णा रसोई में भोजन , 10₹ में  शौचालय:विकास का गणित- देवेंद्र सक्सैना

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सुविधा या मजबूरी का फायदा

अजमेर… इतिहास की धूल से उठकर स्मार्ट सिटी की रोशनी में खड़ा वह शहर, जो कभी राजधानी था। तब लोग मुट्ठी भर पैसे लेकर बाज़ार जाते थे और थैला भरकर राशन लेकर लौटते थे। आज थैला भर नोट ले जाओ तो भी मुट्ठी भर सामान नसीब होता है — और इसे ही आर्थिक प्रगति का ग्राफ बताया जाता है।

कहते हैं विकास हुआ है। बिल्कुल हुआ है। इसका प्रमाण सामने लगी इस तस्वीर में साफ दिखाई देता है — एक ही भवन में “श्री अन्नपूर्णा रसोई योजना” का बोर्ड भी टंगा है और ठीक नीचे “शौचालय व स्नानघर” का संकेत भी चमक रहा है। ऊपर सस्ती थाली, नीचे शुल्क सहित सुविधा। यानी सरकार भूख मिटाने का दावा करती है, और उसी भूख की परिणति पर शुल्क तय करती है। 8 रुपए में भोजन और 10 रुपए में उसे विदा करने का इंतज़ाम — यह गणित शायद अर्थशास्त्र की नई परिभाषा है।

तब लोग जंगल में जाते थे, मजबूरी थी। आज भवन है, बोर्ड है, योजना है, उद्घाटन है — और शुल्क भी है। फर्क बस इतना है कि पहले प्रकृति मुफ्त थी, अब सुविधा सशुल्क है। विकास का मतलब अब सुविधा कम, संरचना ज़्यादा हो गया है।

अजमेर को स्मार्ट सिटी कहा गया। एलिवेटेड रोड चमकी, आनासागर की पाल जगमगाई, पहाड़ियों पर रोशनी की झालरें लहराईं। पर मोहल्लों में पानी की लाइन वही पुरानी, अस्पताल में कतार वही लंबी, और रोजगार के अवसर वही सीमित। विकास का पोस्टर बड़ा है, पर ज़मीन पर अक्षर छोटे हैं।

पहले जंगल थे, अब महल हैं। पहले लोग भगवान के सामने सिर झुकाते थे, अब मंच पर बैठे जनप्रतिनिधि के सामने माला लेकर कतार लगाते हैं। श्याम भजन हो या माता का जागरण, शिवरात्रि हो या रावण दहन — हर आयोजन में वही चेहरे, वही भाषण, वही फोटो। ऐसा लगता है जैसे आस्था भी अब प्रायोजित कार्यक्रम हो गई हो।

नाम बदलना सबसे आसान सुधार है। योजनाओं के नाम बदले, भवनों के नाम बदले, चौक-चौराहों के नाम बदले — इतिहास रचा गया। बस व्यवस्था की मानसिकता नहीं बदली।

सरकारें कहती हैं — “देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है।”
जनता पूछती है — “मजबूती किसकी? जेब किसकी?”

योजनाएँ कागज़ पर सफल हैं, विज्ञापनों में प्रभावी हैं, भाषणों में क्रांतिकारी हैं। लेकिन धरातल पर वही पुरानी फाइलें, वही लंबित कार्य, वही कमीशन की संस्कृति। जनता को लगता है उसे राहत मिली, जबकि असल में वह टैक्स, शुल्क और महंगाई के अदृश्य जाल में और उलझती जाती है।

इस तस्वीर में खड़ा वह भवन केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि व्यवस्था का प्रतीक है — ऊपर दया, नीचे वसूली; ऊपर घोषणा, नीचे गणना।

कटाक्ष यही है —
जब तक जनता चमक देखकर संतुष्ट होती रहेगी, तब तक नींव में लगती दीमक दिखाई नहीं देगी।
जब तक सवाल नहीं पूछे जाएंगे, तब तक 8 रुपए की थाली और 10 रुपए की रसीद ही विकास का प्रतीक बनी रहेगी।

यह लेख किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर है — उस भ्रष्ट व्यवस्था पर — जो देश के विकास को लगी दीमक के समान है।
दीमक दिखती नहीं, पर भीतर से खोखला कर देती है।

अब निर्णय जनता के हाथ में है —
रंगीन बोर्ड देखना है या व्यवस्था की असली तस्वीर समझनी है।

देवेंद्र सक्सैना,अजमेर ।

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