भू-माफिया संग मिलीभगत का खुलासा: पूर्व IAS प्रदीप निरंकर्नाथ शर्मा को 5 वर्ष का कठोर कारावास

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50 हजार रुपये जुर्माना और कारावास, सरकारी भूमि को अवैध तरीके से आवंटित कर राज्य को पहुँचा था करोड़ों का नुकसान

अहमदाबाद, 7 दिसम्बर।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) की लंबी जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद बहुचर्चित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पूर्व आईएएस अधिकारी प्रदीप निरंकर्नाथ शर्मा को पांच वर्ष के कठोर कारावास और 50 हजार रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई गई है। अहमदाबाद स्थित विशेष पीएमएलए न्यायालय ने यह फैसला 6 दिसंबर 2025 को सुनाया।

कई FIR के आधार पर शुरू हुई थी ED की जांच

गुजरात के विभिन्न पुलिस स्टेशनों में दर्ज कई FIR—

03/2010 (31 मार्च 2010),

09/2010 (25 सितंबर 2010, CID क्राइम राजकोट),

06/2014 (30 सितंबर 2014, ACB भुज)
के आधार पर ED ने मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की थी। ये मामले भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज थे।

जिला कलेक्टर रहते कराई थी सरकारी ज़मीन की अवैध रजिस्ट्री

जांच में सामने आया कि भुज (कच्छ) में जिला कलेक्टर पद पर रहते हुए शर्मा ने अन्य लोगों के साथ मिलकर आपराधिक साजिश रची। उन्होंने अपनी अधिकार सीमा से बाहर जाकर सरकारी भूमि को कम दरों पर आवंटित किया।
इससे गुजरात सरकार को 1 करोड़ 20 लाख 30 हजार 824 रुपये का नुकसान हुआ, जबकि आरोपी और उसके सहयोगियों ने अवैध आर्थिक लाभ कमाए।

सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज की थी आरोपी की अपील

इससे पहले आरोपी की डिस्चार्ज याचिका खारिज हो चुकी थी। अपील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सूचित भी यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया था कि—

“मनी लॉन्ड्रिंग एक सतत चलने वाला अपराध है। जब तक अवैध धन को रखा, दिखाया या अर्थव्यवस्था में वापस लाया जाता है, अपराध जारी माना जाएगा।”

अदालत ने साफ कहा कि अपराध जारी न रहने की दलील कानूनन और तथ्यों के आधार पर स्वीकार नहीं की जा सकती।

समयबद्ध तरीके से मुकदमे की सुनवाई के बाद फैसला

हाई कोर्ट पहले ही मामले की सुनवाई समय-सीमा में पूरी करने के निर्देश दे चुका था। वर्षों से लंबित इस मामले में आखिरकार विशेष PMLA कोर्ट ने शर्मा को धारा 3, मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम 2002 के तहत दोषी ठहराया।

सरकारी सेवा में भ्रष्टाचार पर सख्त संदेश

इस निर्णय को सरकारी सेवा में भ्रष्टाचार और भूमि घोटालों में शामिल अधिकारियों के लिए एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सरकारी भूमि का अवैध लाभ उठाकर निजी कमाई करना गम्भीर आर्थिक अपराध है।

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