कैथा में भागवत कथा का चौथा दिन: जड़ भरत से महर्षि दधीचि तक त्याग, तपस्या और लोककल्याण का संदेश

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रीवा।यज्ञों की पावन स्थली कैथा के अति प्राचीन श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में 31 अगस्त से 7 सितंबर तक आयोजित पापविनाशक अमृतमयी श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन शुक्रवार, 4 सितंबर को कथा वाचन के दौरान जड़ भरत और महर्षि दधीचि के प्रेरणादायी प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया गया। आचार्य डॉ. गौरी शंकर शुक्ल के मुखारबिंद से हो रहे कथा प्रवचन में श्रद्धालुओं को भक्ति, वैराग्य, कर्मफल, त्याग और लोककल्याण का गहन संदेश मिला।कथा के दौरान श्रीमद्भागवत महापुराण के पांचवें, छठे और सातवें स्कंध से जुड़े प्रसंगों का वर्णन किया गया। कथा में बताया गया कि भागवत के अलग-अलग स्कंधों को भगवान विष्णु के विराट स्वरूप के विभिन्न अंगों से जोड़ा गया है। इससे पूर्व कथा के तीन दिनों में प्रथम चार स्कंधों का वर्णन पूर्ण हो चुका है, जिसमें भागवत महात्म्य, भगवान विष्णु के अवतार, ब्रह्मा की उत्पत्ति, नारद के पूर्व जन्म, राजा परीक्षित, शौनकादि ऋषियों और शुकदेव संवाद के साथ सृष्टि क्रम तथा ध्रुव और प्रह्लाद जैसे भक्त चरित्रों का वर्णन हुआ।

जड़ भरत की कथा ने समझाया मोह का प्रभाव

पांचवें स्कंध के प्रमुख प्रसंगों में जड़ भरत की कथा का विशेष महत्व बताया गया। कथा में स्पष्ट किया गया कि यहां वर्णित जड़ भरत, दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत नहीं हैं, बल्कि अलग राजा थे।कथा के अनुसार जड़ भरत वैराग्य और तपस्या के मार्ग पर चलने वाले धर्मात्मा पुरुष थे। वन में तपस्या के दौरान एक हिरणी के बच्चे के प्रति उनके मन में करुणा उत्पन्न हुई। सेवा और दया के भाव से शुरू हुआ यह संबंध धीरे-धीरे मोह में बदल गया। जड़ भरत उस मृग के प्रति इतने आसक्त हो गए कि उनकी साधना और वैराग्य प्रभावित होने लगा।मृत्यु के समय भी उनके मन में उसी मृग का भाव बना रहा और कथा के अनुसार अगले जन्म में उन्हें मृग योनि प्राप्त हुई। हालांकि पूर्व जन्म के ज्ञान के कारण उन्हें अपने जीवन की भूल का बोध था। इसके बाद पुनः मनुष्य जन्म प्राप्त कर उन्होंने सांसारिक मोह से स्वयं को दूर रखा और अंततः भगवान की भक्ति के माध्यम से मुक्ति प्राप्त की।कथा वाचक ने इस प्रसंग के माध्यम से कर्म, संस्कार और मृत्यु के समय मन में रहने वाले भावों की महत्ता समझाई। श्रद्धालुओं को संदेश दिया गया कि सात्विक कर्म भी यदि अत्यधिक आसक्ति और मोह का रूप ले लें तो साधक अपने मूल लक्ष्य से विचलित हो सकता है।

महर्षि दधीचि ने लोककल्याण के लिए दे दिया अपना शरीर

कथा के अगले महत्वपूर्ण प्रसंग में महर्षि दधीचि के अद्भुत त्याग और अस्थिदान का वर्णन हुआ। कथा के अनुसार देवताओं के सामने वृत्तासुर का संकट उत्पन्न हुआ और सामान्य अस्त्र-शस्त्र उसके सामने प्रभावहीन साबित होने लगे। तब भगवान नारायण ने देवताओं को महर्षि दधीचि के पास जाने का मार्ग बताया।महर्षि दधीचि से लोककल्याण के लिए उनकी अस्थियों का दान मांगा गया। कथा के अनुसार महर्षि ने बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के मानव और जीव-जगत के कल्याण के लिए अपने शरीर तक का त्याग स्वीकार कर लिया। उनकी अस्थियों से बने वज्र के माध्यम से वृत्तासुर के वध का प्रसंग भागवत में वर्णित है।दधीचि के प्रसंग के माध्यम से कथा में भारतीय ऋषि परंपरा के उस आदर्श को सामने रखा गया, जिसमें व्यक्तिगत सुख और शरीर से ऊपर उठकर समाज, राष्ट्र और समस्त जीव-जगत के कल्याण को महत्व दिया गया है।

कथा में कर्म और त्याग का व्यापक संदेश

प्रवचन के दौरान यह भी समझाया गया कि सनातन परंपरा में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे विचार केवल कथन नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का हिस्सा हैं। महर्षि दधीचि का जीवन इसी भावना का उदाहरण बताया गया, जहां व्यक्ति अपने अस्तित्व से आगे बढ़कर व्यापक कल्याण के लिए समर्पित हो जाता है।दधीचि प्रसंग में देवराज इंद्र, देवगुरु बृहस्पति, विश्वरूप और वृत्तासुर से जुड़े घटनाक्रमों का भी वर्णन किया गया। कथा में इंद्र द्वारा गुरु का अपमान, उसके बाद उत्पन्न संकट, विश्वरूप का वध और वृत्तासुर के प्राकट्य से लेकर महर्षि दधीचि के त्याग तक की कथा को क्रमबद्ध रूप से श्रद्धालुओं के सामने रखा गया।कथा के दौरान विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि अहंकार व्यक्ति को पतन की ओर ले जा सकता है, जबकि त्याग और परमार्थ उसे समाज के लिए आदर्श बना देते हैं।

7 सितंबर तक जारी रहेगी भागवत कथा

कैथा के श्री हनुमान मंदिर प्रांगण में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन 7 सितंबर तक किया जा रहा है। आयोजन समिति की ओर से श्रद्धालुओं से कथा में पहुंचकर आध्यात्मिक प्रसंगों का श्रवण करने का आग्रह किया गया है।

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