“देवनानी मेरे गुरु नहीं, उल्टा उन्हें राजनीति में पहचान हमने दिलाई”
अजमेर में पिछले दो दिनों से राजनीति का तापमान तेज़ी से बढ़ा है। सोशल मीडिया पर लगाए गए आरोपों के बीच धर्मेंद्र गहलोत ने एक वीडियो जारी कर न सिर्फ अपनी सफाई दी, बल्कि वासुदेव देवनानी से जुड़े विवादों पर खुलकर पलटवार भी किया।
मामला तब बड़ा हुआ जब गहलोत पर यह आरोप लगाया गया कि वे देवनानी की धर्मपत्नी के देहावसान और बैठक में शामिल नहीं हुए। सोशल मीडिया पर इसे लेकर उन्हें अहसान फरामोश और गद्दार बताया जाने लगा।
गहलोत की सफाई—“संवेदना मेरे भीतर है, झूठे प्रचार में नहीं”
गहलोत ने कहा कि
➡️ “मैंने संवेदना को राजनीति का माध्यम नहीं बनने दिया, 12वें का कार्य सम्पन्न होने के बाद ही यह बात जनता तक ला रहा हूँ।”
उन्होंने आरोप लगाया कि शोक सभा के बाद ही सोशल मीडिया पर उन्हें बदनाम करने की मुहिम शुरू कर दी गई।
“देवनानी मेरे गुरु नहीं… बल्कि उन्हें राजनीति में पहचान दिलाने वालों में मैं था”
गहलोत ने स्पष्ट कहा कि—
वे 1990 के दशक में छात्र संगठन व प्रकोष्ठ के प्रमुख रहे।
2000–2005 में उपसभापति का दायित्व संभाल चुके थे।
दूसरी ओर देवनानी 2003 में राजनीति में उतरे, इससे पहले वे उदयपुर में शिक्षक थे।
उनका बड़ा बयान—
➡️ “जब मैं पहले से शहर की राजनीति में था और देवनानी को कार्यकर्ताओं सहित मैंने गली–गली में मिलवाया, तो गुरु कौन?”
अहसान फरामोशी के आरोप पर तीखा जवाब
गहलोत ने पलटवार करते हुए कहा—“2005 और 2015 में मुझे टिकट मिला, पार्षदों ने विवादों के बीच भी मुझे सभापति बनाया। अगर चुनाव लड़वाना अहसान है तो दो बार देवनानी ने मुझ पर अहसान किया, लेकिन पांच बार मैंने उनके चुनाव में बागडोर संभाली। असल में अहसान किसने किया—यह जनता तय करे।”
शोक सभा में न पहुँचने का कारण–
गहलोत ने बताया कि जब देवनानी जनवरी में बीमार थे, तब उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरु के कहने पर कुशलक्षेम जाननी चाही , लेकिन वहां से उन्हें कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली।
अपने वीडियो में उन्होंने एक ऑडियो भी चलाया, जिसकी आवाज को उन्होंने देवनानी की बताई। उसमें कहा गया—“गद्दारों और अहसान फरामोशों को फूल भी मत चढ़ाने देना।”
गहलोत का सवाल—
“ऐसे नफरती माहौल में कोई कैसे संवेदना व्यक्त करने जाए?”
“वीर कुमार के आदर्शों पर शहर को खड़ा रखने वालों का जमीर अभी जिंदा है”
इस वीडियो ने दिखा दिया की आज भी अजमेर में ऐसे लोग हैं जो राजनीति से ऊपर उठकर शहर, जनता के लिए अपने गुरुओं के आदर्शों को जिंदा रखे हुए हैं , उनका जमीर आज भी जागा हुआ इंसानियत जिंदा है।
गहलोत के इस वीडियो के बाद शहर में राजनीतिक भूचाल आ गया , शहर भर में चर्चाओं का दौर तेज़ है और माना जा रहा है कि यह मामला आगामी निगम चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकता है।
इस पूरे प्रकरण पर देवनानी या उनके समर्थकों की ओर से किसी भी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आई है, जबकि वे पारिवारिक शोक के बाद सार्वजनिक कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि के रूप में नजर आए।
अब बारी जनता की—कौन सही, कौन गलत?
अजमेर में यह बहस तेजी से उठी है कि राजनीति और जमीर की इस लड़ाई में सच्चाई किस ओर है। क्या देवनानी के रिटायरमेंट से पहले धीरे धीरे उनके सहयोगी अब अलग होने लगे हैं ?
अब फैसला जनता को करना है ।

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