2 अक्टूबर : एक तस्वीर दीवार से उतरकर आज के भारत से सवाल करती है। — देवेंद्र सक्सेना
आज गांधी जयंती है। सरकारी दफ्तरों में तस्वीर पर माला होगी, स्कूलों में भाषण होंगे और सोशल मीडिया पर गांधी के विचारों के संदेश दिखाई देंगे। लेकिन आज एक अलग सवाल पूछने की जरूरत है—अगर गांधी आज हमारे बीच होते तो वे भारत को देखकर क्या देखते?
जिस भारत में गांधी चले थे, वह गुलामी का भारत था। गरीबी थी, अशिक्षा थी, भेदभाव था और अंग्रेजी शासन का दबाव था। गांवों में रहने वाला भारत अपने ही देश में अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा था। गांधी ने उस भारत को केवल राजनीतिक आजादी का सपना नहीं दिखाया, बल्कि यह समझाया कि आजादी का अर्थ तभी पूरा होगा जब अंतिम व्यक्ति को सम्मान, न्याय और अपनी आवाज मिले।
उस समय गांधी के पास न टेलीविजन था, न इंटरनेट, न सोशल मीडिया। उनके पास एक चरखा था, एक लाठी थी, साधारण वस्त्र थे और सबसे बड़ी ताकत थी—जनता का विश्वास।
आज का भारत बिल्कुल अलग है।
आज हमारे पास दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का आत्मविश्वास है। गांवों तक सड़कें पहुंची हैं, मोबाइल ने दुनिया को हथेली में ला दिया है, डिजिटल भुगतान ने बाजार बदल दिया है, अंतरिक्ष में भारत अपनी पहचान बना रहा है और युवा दुनिया भर में भारतीय प्रतिभा का परिचय दे रहे हैं।
लेकिन इसी चमकते भारत के बीच कुछ पुराने सवाल भी खड़े हैं।
क्या विकास के साथ अंतिम व्यक्ति की चिंता भी उतनी ही बढ़ी है?
गांधी के समय में लड़ाई विदेशी शासन से थी। आज लड़ाई कई बार अपने भीतर की कमजोरियों से है—भ्रष्टाचार, हिंसा, नफरत, दिखावे, असमानता, पर्यावरण संकट और सूचना के नाम पर फैलती गलत जानकारी से।
तब गांधी कहते थे कि साधन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना लक्ष्य। आज हमारे सामने सवाल है—क्या मंजिल तक पहुंचने की जल्दी में हम रास्ते की ईमानदारी भूल तो नहीं रहे?
तब सत्याग्रह अंग्रेजी सत्ता के सामने खड़ा था। आज सत्याग्रह का अर्थ शायद यह है कि आम नागरिक गलत देखकर चुप न रहे, लेकिन विरोध करते समय सत्य और अहिंसा की सीमा भी न छोड़े।
तब चरखा आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। आज आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल वस्तु बनाना नहीं, बल्कि अपने गांव, अपने किसान, अपने कारीगर, अपने छोटे व्यापारी और अपने श्रमिक को आर्थिक सम्मान देना भी है।
गांधी ने स्वच्छता को भी केवल सफाईकर्मियों का काम नहीं माना था। आज जब भारत आधुनिक शहरों, स्मार्ट सिटी और बड़े निर्माणों की ओर बढ़ रहा है, तब गांधी का स्वच्छता का विचार और बड़ा सवाल बनकर सामने आता है—क्या हमारा विकास हमारी नदियों, झीलों, हवा और मिट्टी को भी साथ लेकर चल रहा है?
और शायद सबसे बड़ा फर्क यह है कि गांधी के समय सूचना सीमित थी, लेकिन आज सूचना की बाढ़ है। तब एक अफवाह गांव तक पहुंचने में समय लेती थी, आज एक झूठ कुछ सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए आज का सत्याग्रह शायद सही सूचना की रक्षा भी है।
गांधी की जरूरत आज किसी राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार में है।
जब हम रिश्वत देने से इनकार करते हैं, जब कमजोर की आवाज सुनते हैं, जब किसी धर्म या जाति के व्यक्ति को केवल उसकी पहचान से नहीं आंकते, जब सार्वजनिक संपत्ति को अपनी संपत्ति समझते हैं, जब प्रकृति को केवल संसाधन नहीं जीवन मानते हैं—तभी गांधी तस्वीर से निकलकर हमारे व्यवहार में आते हैं।
1947 में भारत ने राजनीतिक आजादी हासिल की थी। 2026 का भारत अब उस आजादी को रोजमर्रा के जीवन में सार्थक बनाने की परीक्षा दे रहा है।
गांधी जयंती पर शायद सबसे सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम गांधी को केवल याद न करें—अपने भीतर यह सवाल जगाएं कि जिस भारत का सपना उन्होंने देखा था, उसमें हमारा योगदान क्या है?
क्योंकि गांधी की सबसे बड़ी विरासत कोई मूर्ति नहीं है।
वह एक सवाल है—
“तुम भारत को कैसा बना रहे हो?”
