संपादकीय | समय का संकेत और हमारी चेतना-देवेंद्र सक्सैना

Spread the love


क्यों नहीं इंसान प्रकृति का इशारा समझ रहा? यह प्रश्न आज केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। कहीं बाढ़, कहीं सूखा, कहीं भूकंप, कहीं महामारी—प्रकृति बार-बार चेतावनी दे रही है कि संतुलन बिगड़ चुका है। फिर भी मनुष्य अपनी सुविधाओं, लालच और अहंकार के आगे इन संकेतों को अनदेखा कर रहा है। प्रकृति के साथ सामंजस्य की जगह उस पर विजय का भ्रम हमें विनाश की ओर धकेल रहा है।
इससे भी अधिक चिंताजनक है कि आज इंसान को इंसान से काटकर धर्म, जाति, वर्ग और पहचान के खांचों में बाँटा जा रहा है। जो सभ्यता “वसुधैव कुटुंबकम्” का संदेश देती थी, वही आज “हम” और “वे” में उलझ गई है। राजनीति हो या समाज, सत्ता हो या सड़क—भेदभाव की भाषा तेज होती जा रही है। सवाल यह नहीं कि धर्म या जाति गलत हैं, सवाल यह है कि उन्हें मानवता से ऊपर क्यों रखा जा रहा है।
ऐसे समय में मथुरा से जयगुरुदेव द्वारा सत्संगों में दी गई चेतावनियाँ याद आती हैं—क्या यह सब किसी बड़े ग्रह-युद्ध या वैश्विक टकराव की आहट तो नहीं? जब मनुष्य की चेतना संकीर्ण होती है, जब करुणा की जगह घृणा ले लेती है, तब युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, मनों में शुरू हो जाता है। और मनों का युद्ध अंततः धरती को भी युद्धभूमि बना देता है।
यह संपादकीय आज सभी से—जनता, शासन-प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, संतों-महात्माओं और विचारकों से—आत्ममंथन की अपील करता है। शासन का दायित्व केवल व्यवस्था चलाना नहीं, बल्कि समाज को जोड़ना भी है। जनप्रतिनिधियों का कर्तव्य केवल वोट नहीं, बल्कि विवेक जगाना है। संतों और महात्माओं की भूमिका केवल अनुयायी बढ़ाना नहीं, बल्कि मानवता को प्राथमिकता देना है। और जनता—जो सबसे बड़ी शक्ति है—उसे नफरत नहीं, समझदारी का साथ देना होगा।
समय अभी भी हाथ से पूरी तरह निकला नहीं है। यदि हम प्रकृति के संकेत समझ लें, यदि इंसान को पहले इंसान मान लें, यदि धर्म को जोड़ने का माध्यम बनाएँ, तो आने वाला कल बच सकता है। वरना इतिहास गवाह है—जब चेतावनियाँ अनसुनी की जाती हैं, तब परिणाम केवल पश्चाताप होते हैं।
आज जरूरत है एकता की, संवेदना की और सामूहिक जिम्मेदारी की। यही सच्चा धर्म है, यही सच्ची साधना, और यही मानवता का भविष्य।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *