एक ओर नशामुक्त भारत का संकल्प, दूसरी ओर ऑनलाइन शराब बुकिंग को बढ़ावा; गली-मोहल्लों और आवासीय कॉलोनियों में खुले शराब ठेकों की वैधता जांचने के लिए आम नागरिकों के पास पारदर्शी ऑनलाइन व्यवस्था क्यों नहीं?
नई दिल्ली/अजमेर| देवेन्द्र सक्सैना
देश को डिजिटल इंडिया बनाने का सपना दिखाया जा रहा है। सरकारी सेवाएं मोबाइल पर पहुंचाई जा रही हैं। अब दिल्ली में शराब की ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा भी चर्चा में है। सरकार इसे डिजिटल सुविधा और व्यवस्थित खरीद की दिशा में कदम बता सकती है, लेकिन सवाल यह है कि इस डिजिटल व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ किसे मिलेगा—आम जनता को या शराब कारोबारियों को?
शराब की दुकान पर जाने के बजाय मोबाइल से ब्रांड चुनने, उपलब्धता देखने और भुगतान करने की सुविधा निश्चित रूप से बिक्री की प्रक्रिया आसान बनाती है। लेकिन क्या सरकार ने कभी उतनी गंभीरता से ऐसी डिजिटल व्यवस्था बनाने पर विचार किया, जिससे नागरिक अपने घर के आसपास खुले शराब के ठेके की वैधता भी जांच सकें?
शराब का ठेका खुल गया, मोहल्ले को पता तक नहीं!
शहरों की अनेक आवासीय कॉलोनियों और गली-मोहल्लों में व्यावसायिक गतिविधियों के बीच शराब की दुकानें खुलने को लेकर स्थानीय निवासियों की आपत्तियां सामने आती रहती हैं। कई बार लोगों को यह तक स्पष्ट नहीं होता कि दुकान को आबकारी विभाग ने किस आदेश से, किस स्थान के लिए और किन शर्तों पर अनुमति दी है।
आखिर नागरिक कहां देखें कि उनके क्षेत्र में कितने शराब ठेकों को मंजूरी दी गई है? किस दुकान का लाइसेंस वैध है? उसका लाइसेंस नंबर क्या है? अनुमति की अवधि कब तक है? दुकान निर्धारित स्थान पर ही संचालित हो रही है या नहीं?
क्या सरकार के पास ऐसा सार्वजनिक ऑनलाइन पोर्टल नहीं होना चाहिए, जहां शहर का नक्शा खोलते ही क्षेत्रवार शराब दुकानों की सूची, लाइसेंस, स्वीकृत स्थान और अनुमति की अवधि दिखाई दे?
बिक्री की सुविधा डिजिटल, जवाबदेही की जानकारी क्यों नहीं?
सरकार यदि शराब की उपलब्धता और बुकिंग को डिजिटल माध्यम से आसान बना सकती है तो शराब दुकानों की वैधता, संख्या और स्थान की जानकारी भी सार्वजनिक कर सकती है। इससे नागरिकों को शिकायत करने से पहले तथ्य मिलेंगे और विभागीय अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी।
सवाल यह भी है कि शराब की दुकान खोलने के लिए किन मानकों, स्थानीय परिस्थितियों और आबकारी नीतियों का पालन किया जाता है? क्या आवासीय क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों की आपत्तियों और सामाजिक प्रभावों को पर्याप्त महत्व मिलता है? इन सवालों के जवाब भी सार्वजनिक होने चाहिए।
एक तरफ नशामुक्त भारत, दूसरी तरफ आसान उपलब्धता!
देश में नशामुक्त भारत अभियान चलाया जाता है। युवाओं को नशे से दूर रहने की अपील की जाती है। परिवारों को नशे के दुष्परिणाम समझाए जाते हैं। लेकिन दूसरी ओर शराब की खरीद को डिजिटल माध्यम से अधिक सुविधाजनक बनाने की पहल किस सामाजिक उद्देश्य को पूरा करती है?
यहां सवाल शराब की कानूनी बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का नहीं, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं का है। क्या राजस्व और व्यापारिक सुविधा के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है?
सरकार को बताना चाहिए कि ऑनलाइन शराब बुकिंग से नागरिकों को क्या लाभ मिलेगा और नशे की उपलब्धता आसान होने से उत्पन्न सामाजिक चिंताओं का समाधान कैसे किया जाएगा।
जनता को चाहिए डिजिटल पारदर्शिता, केवल डिजिटल बिक्री नहीं
दिल्ली सरकार को एक ऐसा सार्वजनिक पोर्टल उपलब्ध कराना चाहिए, जिस पर शहर की प्रत्येक अधिकृत शराब दुकान का नाम, पूरा पता, लाइसेंस नंबर, स्वीकृत स्थान, लाइसेंस की वैधता और संबंधित विभाग की जानकारी उपलब्ध हो। साथ ही नागरिकों को ऑनलाइन शिकायत और उसकी कार्रवाई की स्थिति देखने की सुविधा भी मिलनी चाहिए।
डिजिटल इंडिया का अर्थ केवल खरीद-बिक्री को मोबाइल तक पहुंचाना नहीं, बल्कि सरकारी निर्णयों को जनता की नजर में लाना भी है।
अब निर्णय जनता करेगी कि शराब खरीदने की सुविधा को डिजिटल बनाना जनहित है या शराब कारोबार की सुविधा बढ़ाने का माध्यम? और सरकार से सवाल भी जनता ही पूछेगी—जब बिक्री की जानकारी मोबाइल पर मिल सकती है, तो उसके घर के पास खुली दुकान की वैधता क्यों नहीं? सरकार बताए—डिजिटल इंडिया में नागरिक का अधिकार पहले है या शराब कारोबार की सुविधा?
