उदयपुर और अलवर में कथित तौर पर बाजार मूल्य से कम कीमत पर खरीदी गईं संपत्तियां; निजी कंपनी को सरकारी रियायतें देने के आरोपों की होगी जाँच।
जयपुर। राजस्थान में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों से जुड़े कथित संपत्ति लेन-देन का मामला अब भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की विस्तृत जांच तक पहुंच गया है। राज्य सरकार ने वरिष्ठ IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A के तहत जांच की पूर्व अनुमति दे दी है। ACB महानिदेशक गोविंद गुप्ता ने 30 अक्टूबर को इस कार्रवाई की पुष्टि करते हुए बताया कि प्रारंभिक जांच में प्रथम दृष्टया कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जिनकी विस्तृत जांच आवश्यक है।
क्या है पूरा मामला?
ACB की प्रारंभिक जांच के अनुसार, शिखर अग्रवाल और उनके परिवार के सदस्यों द्वारा उदयपुर के बूझड़ा तथा अलवर के अजाबगढ़ स्थित रिसॉर्ट परिसरों में करीब 40 विला और कॉटेज खरीदे जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि ये संपत्तियां संबंधित बाजार मूल्य से काफी कम कीमत पर खरीदी गईं।
जांच का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू निजी कंपनी गोयल फैशन्स प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है, जो अनंता ब्रांड के तहत होटल और रिसॉर्ट संचालित करती है। ACB के अनुसार, आरोपों में रिसॉर्ट निर्माण की शर्तों में कथित छूट, आवश्यक प्रमाणपत्रों के समुचित सत्यापन के बिना अनुमोदन और कंपनी को विशेष रियायती वित्तीय पैकेज दिए जाने जैसे मामले शामिल हैं।
ब्यूरो इन निर्णयों से सरकारी खजाने को संभावित नुकसान और संबंधित अधिकारियों एवं परिवार के सदस्यों की संपत्तियों की भी जांच करेगा।
IAS के बाद IPS अधिकारी पत्नी भी APO
राज्य सरकार ने 28 अक्टूबर को IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल को APO किया था। इसके बाद 31 अक्टूबर को उनकी पत्नी और वरिष्ठ IPS अधिकारी प्राशाखा माथुर को भी आगामी पदस्थापन आदेशों तक APO कर दिया गया। वह इससे पहले ADGP (प्लानिंग, मॉडर्नाइजेशन एवं वेलफेयर) के पद पर कार्यरत थीं।
हालांकि, उपलब्ध ACB जानकारी के अनुसार वर्तमान जांच का मुख्य केंद्र शिखर अग्रवाल की कथित भूमिका है। पत्नी को APO किया जाना अपने आप में उनके विरुद्ध अपराध सिद्ध नहीं करता।
अब जांच के सामने बड़े सवाल
क्या सरकारी नीतिगत निर्णयों से किसी निजी कंपनी को अनुचित लाभ मिला? क्या संपत्तियों की खरीद और सरकारी रियायतों के बीच कोई संबंध था? क्या सरकारी खजाने को आर्थिक नुकसान हुआ?
इन सवालों का जवाब विस्तृत जांच के बाद ही सामने आएगा। फिलहाल आरोपों को प्रमाणित अपराध नहीं माना जा सकता। संबंधित अधिकारियों को भी अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
सरकारी पद पर रहते हुए लिए गए फैसलों और निजी संपत्ति के लेन-देन के बीच पारदर्शिता की जांच आखिर कितनी प्रभावी होगी?
