भीलवाड़ा : तालाबों से अतिक्रमण हटाने के लिए एनजीटी ने दिए आदेश

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डीटीई रिपोर्ट दिल्ली ।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित फतेहसागर (बड़ा तालाब) और धर्मो तालाब पर हो रहे अतिक्रमण और प्रदूषण के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। न्यायाधिकरण ने जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि दोनों जलाशयों से सभी अवैध निर्माण और अतिक्रमण तत्काल हटाए जाएं तथा इनमें अनुपचारित (गंदे) जल को पूरी तरह रोका जाए।

प्रशासन की लापरवाही

एनजीटी ने पाया कि इन जलाशयों पर अवैध खनन और अतिक्रमण लंबे समय से जारी हैं, जिससे जल निकायों का अस्तित्व खतरे में है। न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह स्थिति न केवल राज्य की संप्रभुता और कानून व्यवस्था को चुनौती देती है, बल्कि जिला कलेक्टर जैसे जिम्मेदार अधिकारियों के सार्वजनिक कर्तव्यों की भी अवहेलना करती है।
एनजीटी ने नाराजगी जताते हुए कहा कि पहले दिए गए आदेशों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जबकि भूमि अभिलेखों में खसरा संख्या 2049 और 2050 को तालाब (फतेहसागर) के रूप में दर्ज किया गया है।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सख्त निर्देश

राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (आरएसपीसीबी) को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया कि किसी भी स्थिति में जलाशयों में बिना शोधित जल न छोड़ा जाए। यदि जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 का उल्लंघन पाया जाता है, तो बोर्ड को दंडात्मक कार्रवाई करने और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की गणना व वसूली करने के आदेश दिए गए हैं।

तीन सप्ताह में रिपोर्ट देनी होगी

एनजीटी ने जिला कलेक्टर, भीलवाड़ा और आरएसपीसीबी से कहा है कि वे तीन सप्ताह के भीतर अपनी कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करें। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिला परिषद की जिम्मेदारी है कि वह अपने क्षेत्र की सभी सार्वजनिक संपत्तियों और तालाबों की रक्षा करे, साथ ही प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम का पालन सुनिश्चित करे।

पहले भी दिए गए थे निर्देश

गौरतलब है कि 9 जुलाई, 2025 को भी एनजीटी ने जिला प्रशासन को ज़रीब पद्धति या ईआईएस/जीपीएस सर्वे के माध्यम से जलाशयों की सीमाएं तय करने और अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। लेकिन अब तक कोई ठोस जवाब दाखिल नहीं किया गया, जिस पर ट्रिब्यूनल ने कड़ा असंतोष जताया है।

अगली सुनवाई 26 नवंबर को

एनजीटी ने अगली सुनवाई की तारीख 26 नवंबर, 2025 तय की है। अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि इस बीच जलाशयों में प्रदूषित जल का प्रवाह जारी रहा या अतिक्रमण नहीं हटाया गया, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर दंडात्मक और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।

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