जयपुर। राजस्थान में पुलिस व्यवस्था और कानून की साख को प्रभावित करने वाला एक गंभीर मामला सामने आया है। अखिल भारतीय कायस्थ महासभा द्वारा राज्य एवं केंद्र सरकार के उच्च अधिकारियों को भेजे गए ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि जयपुर सहित प्रदेश के विभिन्न जिलों में कुछ निजी संस्थाएं अपने वाहनों पर पुलिस से मिलती-जुलती नंबर प्लेट, नेम प्लेट तथा लाल-नीले स्टिकर लगाकर स्वयं को मानवाधिकार संगठन बताकर आमजन को भ्रमित कर रही हैं। महासभा ने इसे कानून व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बताते हुए तत्काल जांच और सख्त कार्रवाई की मांग की है।
महासभा के राष्ट्रीय सचिव ललित सक्सेना द्वारा भेजे गए ज्ञापन में कहा गया है कि कई तथाकथित संगठन “राष्ट्रीय मानव अधिकार”, “अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार” अथवा आयोग जैसे नामों का उपयोग कर आम नागरिकों पर प्रभाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं। आरोप है कि ऐसे लोग सदस्यता, शिकायत समाधान और कार्रवाई के नाम पर आमजन से आर्थिक लाभ लेने का प्रयास करते हैं तथा कई बार प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस कर्मियों पर भी अनावश्यक दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। इससे आम लोगों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है और कानून की वास्तविक व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि पुलिस जैसी नंबर प्लेट और चिन्ह लगे वाहनों को देखकर ट्रैफिक पुलिस सहित अन्य अधिकारी भी कई बार दिग्भ्रमित हो जाते हैं, जिससे अवैध गतिविधियों को अप्रत्यक्ष संरक्षण मिल जाता है। महासभा ने इसे भारतीय मोटर वाहन अधिनियम और आपराधिक कानूनों का खुला उल्लंघन बताते हुए कहा कि सरकारी अधिकार का झूठा प्रदर्शन करना दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।
कानूनी प्रावधानों के अनुसार भारत में केवल वैधानिक रूप से स्थापित संस्थाएं ही मानवाधिकार आयोग के रूप में कार्य कर सकती हैं। इनके अतिरिक्त कोई भी निजी संस्था स्वयं को आयोग बताकर अधिकारिक कार्रवाई करने या सरकारी पहचान का उपयोग करने की पात्र नहीं होती।
महासभा ने सरकार से मांग की है कि पुलिस जैसी नंबर प्लेट, नेम प्लेट और लाल-नीले स्टिकर का अवैध उपयोग करने वालों के विरुद्ध राज्यव्यापी विशेष अभियान चलाया जाए। साथ ही “मानव अधिकार” नाम का दुरुपयोग करने वाली संस्थाओं और लोगों की वैधानिक जांच कर उनके पंजीकरण, वित्तीय स्रोतों और बैंक खातों की जांच कर कठोर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। आमजन को जागरूक करने के लिए सार्वजनिक सूचना जारी करने तथा जिला स्तर पर विशेष जांच टीम गठित करने की भी मांग की गई है।
ललित सक्सैना ने बताया कि यदि समय रहते इस प्रकार की गतिविधियों पर रोक नहीं लगाई गई तो प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है और अपराधी तत्व मानवाधिकार के नाम की आड़ लेकर समानांतर दबाव तंत्र खड़ा कर सकते हैं। अब इस पूरे मामले में राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन की कार्रवाई पर प्रदेशभर की नजरें टिकी हुई हैं।

मानवाधिकार एक समकक्ष न्याय प्रणाली है इसका दुरुपयोग बहुत ही निंदनीय है!!