मंत्री के शहर में स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल! संजय गांधी अस्पताल की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता, आखिर कब तय होगी जवाबदेही?

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जच्चा-बच्चा की मौत से लेकर जिंदा मरीज को मृत घोषित किए जाने तक कई घटनाओं ने सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को कटघरे में खड़ा किया; सीलिंग गिरने और मरीज के उपचार को लेकर परिजनों की शिकायतों ने भी बढ़ाई चिंता

रीवा। विंध्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र माने जाने वाले संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय को लेकर लगातार सामने आ रहे घटनाक्रमों ने अब अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस अस्पताल में रीवा सहित पूरे विंध्य के हजारों परिवार बेहतर और सुरक्षित इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वहां पिछले कुछ दिनों में सामने आई घटनाओं ने मरीजों और उनके परिजनों की चिंता बढ़ा दी है। मामला केवल एक चिकित्सकीय घटना तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अस्पताल की व्यवस्था, निगरानी और जवाबदेही को लेकर व्यापक सवाल उठने लगे हैं।सबसे गंभीर मामला प्रसूता कल्पना मिश्रा और उसके नवजात की मौत का है। 25 वर्षीय कल्पना को 25 अगस्त को संजय गांधी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अगले दिन रात करीब 8:30 बजे उसका सी-सेक्शन किया गया। इसके कुछ ही घंटे बाद कल्पना और उसके नवजात की मौत हो गई। घटना के बाद सामने आए वीडियो ने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया। परिजनों ने उपचार व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए जिम्मेदारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग शुरू कर दी।कल्पना की मौत के बाद मामला लगातार तूल पकड़ता गया। परिवार ने इसे सामान्य चिकित्सकीय घटना मानने से इनकार किया और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया। कल्पना के पिता रामशिरोमणि मिश्रा का आरोप है कि उनकी बेटी की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। वे आंदोलन के जरिए अपनी मांग को लगातार सामने रख रहे हैं।

जिंदा मरीज को मृत घोषित करने की घटना ने भी झकझोरा

इसी अस्पताल से जुड़ा एक दूसरा घटनाक्रम भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना। सीधी निवासी गिरजा प्रसाद को गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 5 सितंबर को चिकित्सकीय परीक्षण के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। इसके बाद परिवार अंतिम संस्कार की तैयारी में जुट गया और शव वाहन तक की व्यवस्था कर ली गई।इसी दौरान परिजनों ने मरीज के शरीर में हरकत महसूस की और सांस चलने की बात सामने आई। इसके बाद अस्पताल में दोबारा उपचार शुरू किया गया। घटना को लेकर अस्पताल के मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. पीके बघेल ने इसे प्रथम दृष्टया चिकित्सकीय आकलन से जुड़ा मामला बताया और दुर्लभ स्थिति ‘लाजरस सिंड्रोम’ का उल्लेख किया।लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने अस्पताल की कार्यप्रणाली को लेकर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया—किसी मरीज को मृत घोषित करने से पहले जांच और पुष्टि की प्रक्रिया कितनी गंभीरता से अपनाई जाती है?

सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की सीलिंग ने भी बढ़ाई चिंता

संजय गांधी अस्पताल परिसर से जुड़े सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में भी सुरक्षा और रखरखाव को लेकर सवाल उठ चुके हैं। यूरोलॉजी विभाग के तीसरे तल पर सीलिंग का एक हिस्सा अचानक नीचे आ गिरा। गनीमत रही कि उस समय वहां कोई मरीज या कर्मचारी मौजूद नहीं था, वरना स्थिति गंभीर हो सकती थी।इससे पहले भी अस्पताल के न्यूरो सर्जरी वार्ड और गैलरी में सीलिंग से संबंधित घटनाएं सामने आने की बात कही गई है। ऐसे में अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर भवन की सुरक्षा और नियमित रखरखाव को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

मरीज के उपचार को लेकर परिजनों की शिकायत ने बढ़ाई बेचैनी

सतना निवासी अर्चना गुप्ता के मामले में भी परिजनों ने उपचार व्यवस्था को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। परिवार का दावा है कि इलाज के दौरान मरीज के शरीर में ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई जिसे लेकर वे बेहद चिंतित थे। परिजन मरीज को दूसरे अस्पताल ले जाने की इच्छा जता रहे थे, लेकिन रेफर को लेकर विवाद की स्थिति बनी।आईसीयू में वीडियो बनाए जाने को लेकर भी परिजनों और अस्पताल कर्मियों के बीच विवाद की बात सामने आई। हालांकि इस मामले में अस्पताल और परिजनों के दावों की वास्तविकता जांच का विषय है, लेकिन घटना ने मरीजों के परिजनों और अस्पताल प्रशासन के बीच भरोसे के सवाल को जरूर सामने ला दिया है।

एक के बाद एक घटनाओं से व्यवस्था पर सवाल

संजय गांधी अस्पताल से जुड़े इन घटनाक्रमों ने अब अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली को लेकर सार्वजनिक बहस छेड़ दी है। एक ओर जच्चा-बच्चा की मौत का मामला है, दूसरी ओर मरीज को मृत घोषित किए जाने की घटना, वहीं अस्पताल भवन के रखरखाव को लेकर सवाल और उपचार को लेकर परिजनों की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।यही वजह है कि अब सवाल किसी एक मरीज या एक परिवार तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि क्या अस्पताल की मौजूदा व्यवस्था मरीजों का भरोसा बनाए रखने के लिए पर्याप्त है?

कल्पना मामले में हो चुकी है कार्रवाई

कल्पना मिश्रा प्रकरण के बाद शासन-प्रशासन की ओर से कार्रवाई भी की गई। दो चिकित्सकों और दो नर्सिंग अधिकारियों को निलंबित किया गया। इसके बाद पांच सदस्यीय जांच समिति गठित की गई। अस्पताल अधीक्षक को हटाने का आदेश जारी हुआ और मामले की मजिस्ट्रियल जांच के निर्देश भी दिए गए।इसके बाद सतना से डॉ. शशिधर गर्ग को रीवा भेजे जाने की कार्रवाई हुई। प्रशासनिक स्तर पर उठाए गए इन कदमों से यह स्पष्ट है कि मामला शासन की गंभीर निगरानी में है, लेकिन पीड़ित परिवार और आंदोलन कर रहे लोगों की मांगें अभी पूरी तरह शांत नहीं हुई हैं।

दिग्विजय सिंह ने व्यवस्था पर उठाई उंगली

रीवा पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी संजय गांधी अस्पताल से सामने आए घटनाक्रमों को लेकर सरकार पर सवाल खड़े किए। उन्होंने अस्पताल में लगातार सामने आ रही गंभीर शिकायतों की जवाबदेही तय करने की मांग की।उन्होंने स्वास्थ्य विभाग की भर्ती प्रक्रिया और नर्सिंग व्यवस्था की भूमिका की भी जांच किए जाने की जरूरत बताई। उनका कहना था कि यदि स्वास्थ्य सेवाओं में लगातार गंभीर शिकायतें सामने आ रही हैं तो सरकार को केवल घटनाओं के बाद कार्रवाई करने के बजाय व्यवस्था की जड़ तक जाकर सुधार करना चाहिए।

कांग्रेस ने स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग तेज की

अस्पताल प्रकरण को लेकर कांग्रेस लगातार आंदोलन कर रही है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था गंभीर संकट से गुजर रही है और इसकी जिम्मेदारी सरकार की है। कांग्रेस ने स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल के इस्तीफे की मांग को भी आंदोलन का प्रमुख मुद्दा बनाया है।दूसरी ओर भाजपा का कहना है कि कल्पना मिश्रा मामले में सरकार ने तत्काल कार्रवाई की है और जांच के बाद जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कठोर कदम उठाया जाएगा। भाजपा ने कांग्रेस पर इस संवेदनशील मामले को राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप भी लगाया है।

अब असली परीक्षा जांच की

संजय गांधी अस्पताल को लेकर उठे सवालों का स्थायी समाधान बयानबाजी से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और व्यवस्था में ठोस सुधार से ही संभव होगा। कार्रवाई हो चुकी है, जांच के आदेश भी हैं, लेकिन आम आदमी को यह भरोसा चाहिए कि सरकारी अस्पताल में पहुंचने के बाद उसके इलाज में किसी भी स्तर पर लापरवाही की गुंजाइश नहीं होगी। क्योंकि सवाल सिर्फ संजय गांधी अस्पताल का नहीं, उस भरोसे का है जिसके सहारे विंध्य का आम आदमी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के दरवाजे तक पहुंचता है। अब देखना यह है कि जांच की रिपोर्ट सामने आने के बाद केवल जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है या फिर उस पूरी व्यवस्था को दुरुस्त करने की पहल होती है, जिसके कारण लगातार सवाल उठ रहे हैं।

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