एक तरफ टीएमसी में अंदरूनी खींचतान, दूसरी ओर हॉकरों के साथ सड़क पर उतरीं ममता, क्या है राजनीतिक संदेश?

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नईदिल्ली/कोलकाता | (प्र. सा ) पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी एक बार फिर सड़क की राजनीति करती नजर आईं। कोलकाता के धर्मतल्ला क्षेत्र में हॉकरों को हटाए जाने के विरोध में उन्होंने अचानक मार्च का नेतृत्व किया। इस मार्च में टीएमसी नेता कुणाल घोष और डोला सेन सहित बड़ी संख्या में समर्थक एवं हॉकर शामिल हुए। एएनआई और अन्य मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जादवपुर स्टेशन रोड सहित कई क्षेत्रों में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान अस्थायी दुकानों और हॉकर स्टॉलों को हटाया गया था, जिसके विरोध में यह प्रदर्शन हुआ।
उधर, हाल के दिनों में टीएमसी के भीतर संगठनात्मक फेरबदल और कुछ नेताओं की नाराजगी की खबरें भी सामने आई हैं। पार्टी नेतृत्व ने कई महत्वपूर्ण पदों पर बदलाव किए हैं, जिसे राजनीतिक पर्यवेक्षक संगठन पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हॉकरों के मुद्दे पर सड़क पर उतरकर ममता बनर्जी ने दोहरे संदेश देने की कोशिश की है। पहला, छोटे व्यापारियों और गरीब तबके के साथ खड़े होने का संदेश; दूसरा, पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह दिखाना कि नेतृत्व अभी भी सक्रिय और संघर्षशील है। हालांकि यह विश्लेषण है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकती।
इस बीच, हॉकरों की बेदखली से जुड़े मामलों पर Calcutta High Court में भी सुनवाई हुई है और कुछ मामलों में 30 जून तक कार्रवाई पर रोक लगाए जाने की खबर सामने आई है। अदालत ने संबंधित एजेंसियों से भूमि स्वामित्व और वैकल्पिक व्यवस्था पर रिपोर्ट मांगी है।
सत्यापन स्थिति:
हॉकरों के समर्थन में ममता बनर्जी के मार्च में शामिल होने तथा बेदखली कार्रवाई की जानकारी विभिन्न समाचार स्रोतों और एएनआई के हवाले से प्रकाशित हुई है। वहीं “सियासी गेम” या इसके पीछे की रणनीति राजनीतिक विश्लेषण का विषय है, जिसकी आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

शीर्षक:
टीएमसी में उठते सवालों के बीच हॉकरों के साथ सड़क पर उतरीं ममता, कोलकाता मार्च के राजनीतिक मायने क्या हैं?

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