मुख्यमंत्री गांवों में, शहर की माताएं आंसुओं में अजमेर की चीख सत्ता तक क्यों नहीं पहुंच रही?

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शहर भगवान भरोसे , सत्ता +प्रशासन गांवों में

अजमेर | विशेष रिपोर्ट

अजमेर| अजमेर शहर आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां शहर की समस्या स्थित,सड़कों पर धूल, माताएं न्याय के लिए रो रही हैं, युवा हादसों और अव्यवस्थाओं में दम तोड़ रहे हैं, लेकिन सत्ता के काफिले गांवों की ओर दौड़ रहे हैं।

राजनीतिक गलियारों में आखिर ऐसा क्या हो गया कि मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, मंत्री और विधायक सभी शहरों से दूरी बनाकर गांवों में डेरा डाल रहे हैं?

क्या शहरों के सवाल इतने तीखे हो चुके हैं कि उनसे आंख मिलाना मुश्किल हो गया है?
या फिर गांव अब आने वाली राजनीति की नई प्रयोगशाला बनने जा रहे हैं?

अजमेर की जनता कह रही है कि —
“शहर की सड़कों से गुजरकर ही गांव पहुंचा जाता है, लेकिन लगता है सत्ता ने अब शहर को सिर्फ रास्ता मान लिया है, मंज़िल नहीं।”

अजमेर: स्मार्ट सिटी या टूटे सपनों का शहर?

जिस अजमेर को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्मार्ट सिटी, सेवन वंडर और आधुनिक विकास योजनाओं के सपने दिए थे, आज वही शहर भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और प्रशासनिक उदासीनता की भेंट चढ़ गया।

सेवन वंडर का ध्वस्त आज भी सवालों के घेरे में हैं।
शहर की सड़कें, यातायात, अवैध निर्माण, हादसे और प्रशासनिक चुप्पी जनता के भीतर गुस्सा पैदा कर रहे हैं।

जनता पूछ रही है —
अगर सब कुछ ठीक है, तो फिर कोई नेता मीडिया के तीखे सवालों का सामना क्यों नहीं करता?

माताओं का क्रंदन बनाम नेताओं की फोटो राजनीति

अजमेर के बहु-चर्चित मित्तल नर्सिंग कॉलेज के नर्सिंग स्टूडेंट की दुर्घटना में हुई मौत से एक साथ तीन परिवारों की दुनिया उजड़ गई । माताओं की आंखों के आंसू पोंछने वाला कोई नहीं जबकि नेताओं का काफिला इन्हीं माताओं के सामने से गुजरता है ।

उपमुख्यमंत्री का अजमेर दौरा या फोटो सेशन ? जनता का कहना है कि बैठकें हुईं, स्वागत हुआ, तस्वीरें छपीं… लेकिन जिन माताओं ने अपने बेटे खो दिए, उनकी आवाज सत्ता तक क्यों नहीं पहुंची? 

क्या शहर की महिलाओं का दर्द अब राजनीतिक एजेंडे में शामिल नहीं?
क्या गांवों में महिला सुरक्षा के गुणगान और शहरों में रोती माताओं की तस्वीरें — यही नया राजनीतिक संतुलन है?

गांवों में बढ़ती राजनीतिक हलचल के संकेत 

जनगणना से पहले गांवों में लगातार बढ़ती राजनीतिक गतिविधियां अब नए सवाल खड़े कर रही हैं।

क्या सरकार गांवों को भविष्य के नए “शहर” में बदलने की तैयारी कर रही है?
क्या जमीन, मकान, व्यापार और बस्तियों का बड़ा सर्वे आने वाला है?
क्या शहरों में अवैध निर्माणों पर बुलडोजर मॉडल लागू करने की भूमिका तैयार हो रही है?

जनता यह भी कह रही है कि —
पहले शहरों को कंक्रीट के जंगल बनाया गया, अब गांवों की हरियाली भी राजनीति और बिल्डरों की साझेदारी में निगली जा रही है।

जहां कभी खेत लहलहाते थे, वहां अब बहुमंजिला इमारतें उग आई हैं।
जहां चौपाल लगती थी, वहां मूढ़डे राजनीतिक मंच पर सज रहे हैं।
जहां मिट्टी पानी पीती थी, वहां अब सीमेंट की सड़कें गर्मी उगल रही हैं।

सबसे बड़ा सवाल

क्या गांवों का भविष्य भी शहरों जैसा होने जा रहा है?
क्या गांव भी कल उन्हीं माताओं की तरह रोएंगे, जिनकी आवाज आज अजमेर में दबाई जा रही है?

और सबसे बड़ा सवाल —
क्या सत्ता अब शहर की पीड़ा से डरने लगी है?

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