कानून-व्यवस्था के नाम पर नागरिकों की संपत्ति पर पहरा/सरकारी अतिक्रमण

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कानून-व्यवस्था के नाम पर नागरिकों की संपत्ति पर पहरा

जयपुर। राजस्थान में जिस प्रस्तावित कानून की चर्चा हो रही है, वह केवल जमीन या मकान की नहीं बल्कि यह कानून सीधे-सीधे आम नागरिक की स्वतंत्रता, संपत्ति के अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद पर सवाल खड़ा करता है। सरकार का तर्क है कि “समुदाय विशेष बहुल” और “अशांत क्षेत्रों” में संपत्ति के सौदों पर नियंत्रण जरूरी है, ताकि पलायन रोका जा सके। लेकिन असल सवाल यह है कि राज्य की विफल कानून-व्यवस्था का बोझ जनता के अधिकारों पर क्यों डाला जा रहा है?


आज संपत्ति पर रोक, कल जीवन पर नियंत्रण -महेंद्र आर्य(ब्रिगेडियर)

आजाज हिंद फौज अजमेर के ब्रिगेडियर महेंद्र आर्य ने बताया कि आज सरकार कह रही है कि संवेदनशील इलाकों में संपत्ति बेचने या खरीदने से पहले कलेक्टर की अनुमति जरूरी होगी। कल क्या यह भी तय किया जाएगा कि कौन कहां रह सकता है, कौन किस मोहल्ले में दुकान खोल सकता है और कौन किस इलाके में बसने योग्य है? यह सोच लोकतंत्र की नहीं, बल्कि एक ऐसे नियंत्रण-तंत्र की पहचान है, जहां नागरिक को मालिक नहीं बल्कि अनुमति पर निर्भर व्यक्ति बना दिया जाता है।


संविधान से मिले अधिकारों पर सीधा प्रहार

आर्य ने बताया कि संविधान का अनुच्छेद 300-A नागरिक को संपत्ति का अधिकार देता है और अनुच्छेद 19 स्वतंत्र जीवन व व्यापार की गारंटी देता है। लेकिन यह प्रस्तावित कानून साफ संदेश देता है कि “आप मालिक हैं, फिर भी आपकी संपत्ति आपकी नहीं है।” यह कानून-व्यवस्था का उपाय नहीं, बल्कि कानून के नाम पर भय और असुरक्षा पैदा करने वाला कदम है।


‘समुदाय विशेष’ शब्द—सबसे बड़ा और खतरनाक सवाल

आर्य ने बताया कि यह कानून “समुदाय विशेष बहुल क्षेत्र” जैसी अस्पष्ट और संवेदनशील शब्दावली। आज सरकार किसी इलाके को अशांत घोषित करेगी, कल किसी नागरिक को संदिग्ध। ऐसी भाषा सामाजिक समरसता को मजबूत नहीं करती, बल्कि समाज को स्थायी अविश्वास और विभाजन की ओर धकेलती है।


सरकार से सीधा सवाल: अपराधी आज़ाद, नागरिक नियंत्रित क्यों?

आर्य ने सरकार ए सवाल करते हुए कहा कि अगर पलायन हो रहा है, अगर लोग डर के कारण घर छोड़ रहे हैं, तो सवाल यह है कि अपराधियों पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? दंगाइयों को त्वरित सजा क्यों नहीं मिल रही? पीड़ित को सुरक्षा देने की बजाय सरकार नागरिकों की संपत्ति पर पहरा क्यों बैठा रही है? क्या प्रशासन की नाकामी की कीमत अब आम जनता चुकाएगी?


प्रशासनिक अनुमति का मतलब—भ्रष्टाचार का नया दरवाज़ा

आर्य ने बताया कि देश पहले से ही आंतरिक भ्रष्टाचार जैसे आतंकियों से पीड़ित है । वहीं ऐसी कानून व्यवस्था प्रशासनिक आत्ताइयों का मनोबल बढ़ाने का काम करेगी, मजबूरी में घर बेचने वाला व्यक्ति प्रशासनिक गलियारों में भटकने वाला याचक बन जाएगा। यह कानून जनता को सुरक्षा नहीं, बल्कि जनता को अफसरशाही के सामने असहाय बना देगा।


अब सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, जनता से भी है

आर्य ने कहा कि जनता को मानना होगा कि ऐसी नीतियां अचानक नहीं आतीं। ये उसी राजनीति की उपज हैं, जिन्हें जनता बार-बार चुनती रही है। अगर आज भी देश से बड़ा धर्म देखा जाएगा, बाहुबलियों को नेता माना जाएगा और डर या जाति के नाम पर वोट दिया जाएगा, तो आने वाली पीढ़ी का क्या होगा—इसका अंदाजा शायद आज की पीढ़ी भी नहीं लगा पा रही।


जनप्रतिनिधि या सत्ता के रक्षक?

आर्य ने बताया कि जनता ने जिन जनप्रतिनिधियों को सुरक्षा, न्याय और विकास के लिए चुना था, वही आज ऐसे कानूनों पर जनता मौन हैं । जन प्रतिनिधि जनता की आवाज़ बनने की बजाय सत्ता के एजेंट बन जाएं, तो लोकतंत्र खोखला होता रहेगा।


अब जरूरत है राम राज्य की नीतियों की

आर्य ने आज की युवा पीढ़ी को देश का भविष्य बताया वहीं या युवाओं के लिए संदेश देते हुए कहा कि अब जरूरत ऐसे जनप्रतिनिधियों की जो इन अतिक्रमणकारीयों की टोली के संरक्षक न बनें, बाहुबलियों के सामने ना झुकें और भय की राजनीति दूर होकर भगवान राम के राम राज्य की उस सोच को आगे बढ़ाएं जहां न्याय त्वरित हो, अपराधी दंडित हो और निर्दोष नागरिक सुरक्षित हों ।


निकाय चुनाव: सिर्फ मतदान नहीं, चेतावनी

आर्य ने बताया कि जनता को इन आने वाले निकाय चुनावों से ऐसे जनप्रतिनिधियों को हटाना होगा जो दशकों से सत्ता में रह रहे हैं,उनके सामने ऐसे कानूनों का बनना यही दर्शाता है कि उनकी चुप्पी किन्ही अहसानों और मजबूरियों के कदम तले दब चुकी है, जिन्हें सत्ता से बाहर कर जनता के पास इन आने वाले निकाय चुनावों में अपनी खोई हुई ताकत सरकार और सत्ता को चेतावनी के देने का मौका है। अगर जनता ने अब भी जवाब नहीं दिया ,सवाल नहीं पूछे, तो फिर अपनी संपत्ति, अपनी आज़ादी और अपने भविष्य की रक्षा खुद ही करनी होगी।

लोकतंत्र वोट से नहीं जागरूकता से जीवित रहता है

लोकतंत्र कानून के डर से नहीं, न्याय से चलता है। लोकतंत्र केवल वोट से नहीं, जागरूक नागरिकों से जीवित रहता है। आज अगर जनता चुप रही, तो कल उसकी चुप्पी का खामियाजा आने वाली पीढ़ी भुगतेगी। फैसला आज करना है—या तो अभी सवाल उठाइए, या भविष्य को असुरक्षित होने के लिए तैयार रहिए ।

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