EVM या बैलेट? लोकतंत्र के नाम पर प्रयोग
Jaipur।(मीडिया) कर्नाटक में स्थानीय निकाय चुनावों को EVM से हटाकर बैलेट पेपर से कराने के फैसले ने पूरे देश की चुनावी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल सिर्फ तकनीक का नहीं है, सवाल है लोकतंत्र की एकरूपता और जनता के विश्वास का। अगर EVM सुरक्षित है तो पूरे देश के लिए सुरक्षित क्यों नहीं? और अगर संदेह है तो अन्य राज्यों में होने वाले निकाय चुनाव भी बेलेट पेपर से करवाए जाएंगे या सिर्फ यह नियम कर्नाटक तक सीमित रहेगा? यह फैसला पूरी तरह राज्य निर्वाचन आयोग और सरकार का प्रशासनिक निर्णय है।
अब निगाहें राजस्थान पर हैं। क्या राजस्थान सरकार भी कर्नाटक की तर्ज पर निकाय चुनाव बैलेट पेपर से कराएगी? अगर हां, तो किस आधार पर? और अगर नहीं, तो क्या राजस्थान का मतदाता अलग किस्म का लोकतंत्र जी रहा है? एक ही देश में अलग-अलग चुनाव प्रणाली, क्या यह संविधान की भावना के अनुरूप है या फिर लोकतंत्र के साथ छल ?
आज स्थिति यह है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव भारत निर्वाचन आयोग कराता है और स्थानीय निकाय चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग। नतीजा—दो आयोग, दो नियम, दो सिस्टम। मतदाता वही, लोकतंत्र वही, लेकिन वोट डालने का तरीका राज्य बदलते ही बदल जाता है। क्या यह चुनाव सुधार है या व्यवस्था की विफलता?
राजनीतिक दल जीतते हैं तो EVM पर भरोसा करते हैं, हारते हैं तो उसी EVM को कठघरे में खड़ा कर देते हैं। अब बैलेट पेपर को “लोकतंत्र की असली ताकत” बताया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र मशीन या कागज़ से मजबूत होता है, या फिर ईमानदार नीयत और समान नियमों से?
अगर आने वाले समय में कुछ राज्य बैलेट से और कुछ EVM से चुनाव कराएंगे, तो यह केवल प्रशासनिक असमानता नहीं होगी, बल्कि मतदाता के मन में संदेह का बीज बोने जैसा होगा। लोकतंत्र को ताकत तब मिलती है जब नियम एक हों, भरोसा एक हो और प्रक्रिया पर कोई सवाल न उठे।
देश आज पूछ रहा है—
एक देश, एक वोट, तो एक चुनाव व्यवस्था क्यों नहीं?
क्या लोकतंत्र राजनीतिक प्रयोगशाला बन चुका है?
अगर हर राज्य अपनी सुविधा से चुनाव प्रणाली बदलेगा, तो नतीजे चाहे जो हों, सवाल हमेशा जिंदा रहेंगे। और सवालों से घिरा लोकतंत्र, मजबूत नहीं—कमजोर होता है।
