नई दिल्ली/ऑनलाइन।
288वीं ऑनलाइन आरटीआई मीट में देशभर के सूचना आयुक्तों द्वारा दिए गए कथित गैरकानूनी और पक्षपातपूर्ण निर्णयों को लेकर चर्चा हुई। ऑनलाइन मीटिंग में आरटीआई कार्यकर्ताओं, कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सूचना के अधिकार को कमजोर करने वाले फैसलों पर चिंता जताते हुए न्यायपालिका, सूचना आयोगों और सरकार की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए।
होस्ट शिवानंद द्विवेदी ने सूचना आयुक्तों के साथ होने वाली व्यक्तिगत बैठकों में ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को अनिवार्य बताते हुए कहा कि इससे न केवल बातचीत का प्रमाण सुरक्षित रहेगा, बल्कि गलत सूचनाओं और दबाव की राजनीति से भी बचा जा सकेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पारदर्शिता ही आरटीआई कानून की आत्मा है और उसी को मजबूत करने की जरूरत है।
गुजरात से आरटीआई कार्यकर्ता भरत पांडा ने राज्य सूचना आयोग के साथ अपने अनुभव साझा करते हुए गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार और स्पष्ट अनियमितताओं के प्रमाण देने के बावजूद आयुक्तों द्वारा जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। भरत ने 100 करोड़ रुपये के कथित भूमि घोटाले का जिक्र करते हुए आयोग की निष्क्रियता को चिंताजनक बताया और उच्च न्यायालय तथा सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करने की प्रक्रिया की जानकारी दी।
बैठक में यह मुद्दा भी प्रमुखता से उठा कि कई राज्यों में सूचना आयुक्तों की नियुक्तियां गृह विभाग या सत्ता से जुड़े अधिकारियों के प्रभाव में हो रही हैं, जिससे उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। प्रतिभागियों ने कहा कि ऐसे हालात में आरटीआई कानून आम नागरिक के लिए केवल कागजी अधिकार बनकर रह जाएगा।
कानूनी रणनीति पर चर्चा करते हुए शिवानंद द्विवेदी ने सुझाव दिया कि प्रभावित पक्षों को विशेषज्ञ आरटीआई वकीलों से परामर्श लेकर नजदीकी उच्च न्यायालय में याचिका दायर करनी चाहिए, जिससे कम खर्च में न्याय और मीडिया का ध्यान दोनों मिल सके। उन्होंने यह भी कहा कि ऑडियो साक्ष्य अदालत में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
बैठक का निष्कर्ष साफ था—सूचना आयोगों में पारदर्शिता, जवाबदेही और स्वतंत्रता सुनिश्चित किए बिना सूचना के अधिकार की मूल भावना को बचाया नहीं जा सकता। आरटीआई कार्यकर्ताओं ने संकेत दिए कि आने वाले समय में इस मुद्दे पर कानूनी और जनआंदोलन दोनों स्तरों पर संघर्ष और तेज होगा।
