“ईश्वर के घर देर है, अंधेर नहीं”—हमने यह कहावत केवल सुनी नहीं, बल्कि समय-समय पर व्यवस्था में बैठे उन लोगों के जीवन में सच होते देखा है जिन्होंने सत्ता को सेवा नहीं, सत्ता-लोभ और निजी लाभ का साधन बना लिया। दुखद यह है कि आज भी देश का एक बड़ा हिस्सा ऐसे भ्रष्ट लोकसेवकों की गिरफ्त में है, जिन्होंने व्यवस्था को अपनी जागीर और जनता को अपनी भूल समझ रखा है।
देश की हालत यह है कि भ्रष्टाचार के सामने कानून कमजोर पड़ जाता है, और विभागीय सांठगांठ सच को फाइलों में दफना देती है। अपराधी कंधे उचकाकर रिटायर होते हैं और सम्मानित पदों पर बैठ जाते हैं—जबकि पीड़ित आज भी न्याय की प्रतीक्षा में दर-दर भटकता है।
जब पूरा सिस्टम ही भ्रष्ट को बचाने उतर आए
राजस्थान आवासन मंडल, जयपुर का प्रकरण इस जंग लगे सिस्टम की भयावह तस्वीर पेश करता है।
अजमेर के एक आवंटी ने विभाग के उच्च अधिकारी को दस्तावेजी प्रमाणों के साथ जानकारी दी—कि कैसे रीजनल इंजीनियर (RE) ने फर्जी नोटिस जारी कर लाखों की उगाही कर , सरकारी रजिस्टर में काट-छाँट कर नियमों का मजाक उड़ाया और विभाग को करोड़ों का नुकसान पहुँचाया।
मामले को गंभीरता को जानकर अजमेर के तत्कालीन जिला कलेक्टर ने कार्रवाई के निर्देश दिए, पर जैसे ही मामला विभागीय तंत्र के सामने पहुँचा—पूरा सिस्टम एकजुट होकर भ्रष्ट अधिकारी का कवच बन गया। फाइल बंद, कार्रवाई ठंडी, और कुछ ही महीनों में—जयपुर बैठे उच्च अधिकारी अब रिटायर होकर आज पूर्व सरकार के करीबी चैनल में वरिष्ठ पद पर स्थापित कर दिए गए।
क्या यह न्याय है ?
या सिस्टम में जमी सड़ांध का प्रमाण?
रामराज्य की चाह और सड़ी हुई व्यवस्था की चुनौती
भारत आज एक नए युग की दहलीज पर खड़ा है। जनता रामराज्य की कल्पना केवल धार्मिक अर्थों में नहीं, बल्कि न्याय, पारदर्शिता और लोकसेवा की वास्तविकता में देखना चाहती है।
लेकिन दुख यह है कि लोकसेवक धर्म और कर्तव्य को भूलकर निजी महल खड़े करने में लगे हैं—जबकि आम नागरिक का घर नियमों और नोटिसों की ठंड में कांपता है।
सरकारें बदल रही हैं, नीतियाँ बदल रही हैं—लेकिन सिस्टम में बैठे “पुराने भ्रष्ट गार्ड” आज भी उसी ताकत से खड़े हैं, बल्कि कई रिटायर होने के बाद भी विभागों पर अपनी (संविदा कर्मी) के रूप में दबदबा बनाए हुए हैं। यही कारण है कि नए अधिकारी भी जिम्मेदारी निभाने से डरते हैं, सच बोलने से डरते हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने से डरते हैं।
सरकार के सामने चुनौती: जवाबदेही ?
देश को जंग किसने लगाया ?
यदि भारत को विकसित भारत बनाना है, तो सबसे पहले भ्रष्टाचार की जड़ पर चोट करनी होगी।
यह तभी संभव है जब: रिटायर्ड अफसरों की भी जांच अनिवार्य हो । भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्तियाँ जब्त हों,फर्जी नोटिस, उगाही और रजिस्टर छेड़छाड़ जैसी घटनाओं पर SIT जांच हो
विभागीय संरक्षण तंत्र तोड़ा जाए। सेवा लाभ वापस लिए जाएँ
कठोर सजा और जेल भ्रष्टाचारियों का ठिकाना हो
सरकारें यह समझें कि जनता इस जंग लगे सरकारी तंत्र से त्रस्त है वह अब केवल घोषणाओं पर नहीं, परिणामों पर विश्वास करती है।
जनता की भूमिका: आवाज उठाना ही सबसे बड़ा हथियार
परिवर्तन केवल सरकारों के दम पर नहीं होगा।
जनता की जागरूकता, शिकायत का साहस, और सच बोलने की हिम्मत ही सिस्टम की सफाई का रास्ता बनाएगी।
जाति-धर्म, राजनीति और दबाव से ऊपर उठकर, जनता को अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना होगा।
जब जनता मौन होती है—तो भ्रष्टाचार मुखर हो जाता है।
अब समय आ चुका है…
अब वह समय नहीं है जो भ्रष्टाचार को “नियम” और जनता को “अज्ञानी” मानकर सरकारें ,अधिकारीयों को भी संरक्षण दें ।
समय सत्य की स्थापना का
जिस दिन सरकारें यह समझ लेंगी कि जवाबदेही ही विकसित भारत की पहली शर्त है—उस दिन व्यवस्था की जंग खुद-ब-खुद साफ होने लगेगी।
जनता का सवाल आज भी जीवित है : देश के सिस्टम को जंग लगाने वालों पर कार्रवाई कौन करेगा ? कौन इन्हें बचा रहा ? क्यों आज भी यह खुले आम सिस्टम पर कब्जा किए बैठे हैं ।
रामराज्य की स्थापना वर्तमान जंग लगा सिस्टम करेगा या कोई अवतारी फिर इस धरती पर जन्म लेगा ?
