अजमेर:सड़कें शहर की धमनियाँ कही जाती हैं। इन धमनियों पर दौड़ते हैं रफ्तार के राक्षस – बजरी से भरे डंपर और 16 टायर वाले विशाल ट्रक। लोहे के ये पहाड़ जब गति पकड़ते हैं, तो इंसानी ज़िंदगी की कीमत उनकी नजर में एक तिनके से भी कम रह जाती है। हर दिन, हर घड़ी किसी न किसी शहर, कस्बे या गाँव से यह खबर आती है कि एक मासूम इन दैत्याकार वाहनों के नीचे कुचल गया। कहीं पिता अपनी बिटिया को स्कूल छोड़ने निकला था और वह वापस लौटी ही नहीं, कहीं माँ अपनी गोद के लाल को लेकर बाज़ार जा रही थी ,कहीं पिता अपनी बेटी के सपने पूरे करने के लिए ले जा रहा और अचानक ट्रक के पहिए ने उसकी पूरी दुनिया ही छीन ली।
यह सिर्फ हादसा नहीं है, यह रुदन की गूंज है, यह दर्द का अथाह सागर है, यह तड़पती चीख है जो आसमान को चीर देती है। परंतु अफसोस, यह सब कुछ क्षणिक है – मीडिया में एक दिन की खबर, चौराहे पर थोड़ी देर की चर्चा और फिर मौन। लेकिन उस घर में जहाँ मासूम की चिता जलती है, वहां यह तड़प उम्रभर की यातना बन जाती है।
एक पल में उजड़ता संसार :-
सोचिए… कोई पिता अपनी 10 साल की बेटी को साइकिल पर बिठाकर स्कूल छोड़ने जा रहा हो, और अचानक पीछे से आती रफ्तार का शैतान उसे अपने नीचे कुचल दे। सड़क पर बिखर जाती किताबें, खून से लथपथ छोटी सी ड्रेस, और माँ के सपनों का अंत। घर में वह बेटी जो हंसी से आंगन को गुलजार करती थी, अब सिर्फ दीवारों पर टंगी तस्वीर बन जाती है। माता-पिता की आँखों का तारा बुझ जाने के बाद, उनका जीवन सिर्फ एक लंबी सज़ा बन जाता है।
जब बच्चे मरते हैं तो सिर्फ उनका जीवन नहीं छिनता, बल्कि माता-पिता का भविष्य भी जलकर राख हो जाता है। जिस गोद में हंसी गूंजती थी, वह गोद सूनी पड़ जाती है। उनकी आँखें हर वक्त दरवाज़े की ओर देखती रहती हैं, मानो मासूम दौड़ता हुआ वापस आ जाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि उनकी प्रतीक्षा अब सिर्फ एक तड़प है, एक न खत्म होने वाला रुदन है।
जिम्मेदारी का सवाल ?
हर बार हादसे के बाद यही सवाल उठता है – जिम्मेदार कौन?
क्या यह ड्राइवर की लापरवाही है जो नींद या शराब के नशे में ट्रक चला रहा था?
क्या यह पुलिस और प्रशासन की ढीली व्यवस्था है जो इन दैत्याकार वाहनों को शहर की गलियों में बिना रोक-टोक दौड़ने देते हैं?
या फिर यह हम सबकी चुप्पी है, जो हर बार मोमबत्ती जलाकर, दो मिनट का मौन रखकर और सोशल मीडिया पर दुख जताकर अगली खबर की ओर बढ़ जाते हैं?
इन हादसों में जिम्मेदार सिर्फ एक नहीं, बल्कि पूरा सिस्टम है। लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिम्मेदारी का बोझ किसी पर टिकता नहीं। दोषी ड्राइवर जेल से छूटकर फिर गाड़ी चलाने लगता है, प्रशासन नए आदेश जारी कर भूल जाता है, और जनता अपनी तकलीफों में डूबकर हादसे को यादों के अंधेरे में छोड़ देती है।
रुदन का शहर, तड़पते परिवार :-
एक माँ जब अपने बेटे की लाश को देखकर चीखती है – “मेरा लाल मुझे लौटा दो” – तो पूरा माहौल श्मशान बन जाता है। पिता का सीना फट जाता है, लेकिन वह आँसुओं को रोककर लकड़ी का गट्ठर उठाता है और चिता सजाता है। छोटे भाई-बहन मासूमियत से पूछते हैं – “भैया कहाँ गया?” और घर के लोग चुप रहकर दीवार की ओर देख लेते हैं। यह मौन शब्दों से अधिक भयावह है।
ऐसे घरों में अब न त्योहार मनते हैं, न खुशियाँ लौटती हैं। दिवाली के दीपक बुझ जाते हैं, होली के रंग सूख जाते हैं। यह सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि पूरे परिवार की जिंदगी की हत्या है।
प्रशासन की नींद :-
हर हादसे के बाद कुछ दिन के लिए प्रशासन सक्रिय होता है। जगह-जगह नाके लगते हैं, कागजों पर मीटिंग होती है, ड्राइवरों को नियमों की याद दिलाई जाती है। लेकिन यह सब अस्थायी है। कुछ ही हफ्तों बाद फिर वही ढर्रा – रफ्तार, लापरवाही और मौत।
अगर सच में प्रशासन चाहे, तो समाधान मुश्किल नहीं है।
शहर की सीमा में भारी वाहनों का प्रवेश सख्ती से रोका जाए।
रात और दिन के समय अलग-अलग मार्ग तय हों।
ड्राइवरों के लिए नियमित स्वास्थ्य और नशा-जांच अनिवार्य हो।
स्पीड लिमिट तोड़ने पर कठोरतम सजा हो।
लेकिन जब तक ये कदम केवल कागजों तक सीमित रहेंगे, तब तक मासूमों की बलि जारी रहेगी।
मौन समाज की जिम्मेदारी :-
हमारा समाज भी दोषी है। हम सड़क किनारे खून बहते देख चुप रहते हैं। मदद के बजाय मोबाइल निकालकर वीडियो बनाते हैं। हम हादसे के शिकार परिवार को सांत्वना तो देते हैं, लेकिन उसके लिए न्याय की लड़ाई में कदम से कदम मिलाकर नहीं चलते।
जब तक जनता एकजुट होकर प्रशासन से सवाल नहीं पूछेगी, तब तक यह मौन जिम्मेदारी मासूमों की जान लेती रहेगी। हमें यह समझना होगा कि किसी और का बच्चा कुचला जाए या हमारा, दर्द एक जैसा है।
मौन नहीं, आंदोलन चाहिए :-
यह लेख कोई भावुकता फैलाने का प्रयास नहीं, बल्कि एक चीख है। यह उन माता-पिता की चीख है जिनकी गोद सूनी हो चुकी है। यह उन बच्चों की अधूरी हंसी है जो ट्रकों के पहियों तले दबकर हमेशा के लिए मौन हो गए।
अब समय है कि हम केवल रुदन और तड़प में न डूबे रहें। अब समय है कि हम प्रशासन को जगाएं, कड़े कानून की मांग करें और सड़कों पर चलने वाले इन राक्षसी वाहनों पर नियंत्रण की ठोस व्यवस्था करें।
क्योंकि हर बार हादसे के बाद यही सवाल गूंजता है –
“जिम्मेदार कौन?”
और अगर हमने अब भी आवाज़ नहीं उठाई, तो अगला नाम किसी और मासूम का होगा, शायद आपका या हमारा अपना।
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सच बयां करता अंतरमन से निकला एक प्रभावशाली राइटअप…..सवाल है…. जिम्मेदार कब जागेंगे….. 🙏
thnks