अजमेर। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 को भारत में पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए एक ऐतिहासिक कानून माना जाता है। लेकिन इसके लागू होने के 18 साल बाद भी यह अधिनियम कई स्तरों पर गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है।
उत्तराखंड सूचना आयोग के सूचना का अधिकार विशेषज्ञ प्रशिक्षक विरेंद्रकुमार एम. ठक्कर ने हाल ही में एक रिपोर्ट में बताया कि देशभर में RTI के क्रियान्वयन में संरचनात्मक, संस्थागत और परिचालन स्तर की बाधाएँ मौजूद हैं।

संसाधनों की कमी से कमजोर क्रियान्वयन
विशेषज्ञ रिपोर्ट के अनुसार, सार्वजनिक सूचना अधिकारियों (PIOs) के पास पर्याप्त स्टाफ और तकनीकी सुविधाएँ नहीं हैं। इससे समय पर जानकारी देना कठिन हो जाता है। अधिनियम की धारा 4 के तहत सरकारी विभागों को सूचना पूर्व-सक्रिय रूप से सार्वजनिक करनी होती है, लेकिन अधिकांश विभाग अपनी वेबसाइट अपडेट नहीं करते। धारा 25 के तहत वार्षिक रिपोर्ट भी समय पर प्रस्तुत नहीं होतीं, जिससे संसद और विधानसभाओं में पारदर्शिता के मूल्यांकन में बाधा आती है।
सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में देरी और राजनीतिक प्रभाव
रिपोर्ट में कहा गया है कि सूचना आयुक्तों की समय पर नियुक्ति न होना और चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी एक बड़ा संस्थागत अवरोध है। अंजलि भारद्वाज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने समय पर नियुक्ति करने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद कई आयोगों में पद खाली रहने से अपीलों का बैकलॉग बढ़ रहा है। रिपोर्ट ने यह भी कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में राजनीतिक प्रभाव आयोगों की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है।
PIOs और अपीलीय प्राधिकरणों का अपर्याप्त प्रशिक्षण
नमित शर्मा मामले के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया कि PIOs और DAAs को कानूनी प्रशिक्षण देना अनिवार्य है। बिना प्रशिक्षण के वे RTI आवेदन गलत तरीके से संभालते हैं, जिससे देरी, अस्वीकृति और अस्पष्ट जवाब बढ़ जाते हैं।
डिजिटल अवसंरचना और आभासी (डिजिटल)सुनवाई की जरूरत
रिपोर्ट में जोर दिया गया कि सभी राज्यों को ऑनलाइन RTI पोर्टल और ऑनलाइन (डिजिटल) सुनवाई की व्यवस्था करनी चाहिए। किशन चंद जैन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 31 दिसंबर 2023 तक आभासी सुनवाई शुरू करने का निर्देश दिया था। इससे आम नागरिक और सरकारी अधिकारी बिना यात्रा के अपील प्रक्रिया में भाग ले सकेंगे।
राजनीतिक दलों को RTI के दायरे में लाना अनिवार्य
रिपोर्ट में बताया गया कि राजनीतिक दल सार्वजनिक धन लेते हैं और नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए उन्हें भी RTI के दायरे में लाया जाना चाहिए। अश्विनी कुमार उपाध्याय मामले और सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित करने को इस दिशा में अहम कदम बताया गया।
न्यायपालिका में पारदर्शिता का महत्व
सुभाष चंद्र अग्रवाल मामले के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया कि न्यायपालिका RTI से बाहर नहीं रह सकती। जजों की नियुक्ति और स्थानांतरण में पारदर्शिता लाना न्यायपालिका की जवाबदेही बढ़ाएगा।
सुधार की जरूरत पर जोर
रिपोर्ट में छह प्रमुख सुझाव दिए गए धारा 4 और 25 का सख्त पालन, सूचना आयुक्तों की समय पर नियुक्ति, PIOs का कानूनी प्रशिक्षण, राज्यों में एक समान ऑनलाइन RTI पोर्टल, राजनीतिक दलों को RTI के तहत लाना और न्यायिक नियुक्तियों को अधिक पारदर्शी बनाना।
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