(संपादकीय व्यंग्य)
कहते हैं कि जब महाभारत का युद्ध खत्म हुआ, तो कुरुक्षेत्र के मैदान में अजीब-सी शांति थी। शंख बंद हो चुके थे, तलवारें थम चुकी थीं, और हवा में विजय का उत्साह नहीं बल्कि पछतावे की गंध थी, जीतने वाले भी रो रहे थे, हारने वाले भी।
राजा युधिष्ठिर युद्ध जीत चुके थे, लेकिन उनके चेहरे पर खुशी नहीं थी। राजसिंहासन सामने था, फिर भी मन भारी था। उन्हें लग रहा था कि इस जीत की कीमत बहुत महँगी पड़ गई — अपने ही गुरु, अपने ही रिश्तेदार और अपने ही लोग युद्ध में मारे गए।
तब श्रीकृष्ण उन्हें लेकर गए भीष्म पितामह के पास।
भीष्म तीरों की शैय्या पर लेटे थे, शरीर घायल था, लेकिन अनुभव और बुद्धि अब भी पर्वत की तरह अडिग थी।
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा –
“राजन, युद्ध जीतना कठिन नहीं है। कठिन यह है कि उसके बाद टूटे समाज को फिर से जोड़ना। असली राजा वह है जो अपने घमंड को जीत ले।”
युधिष्ठिर ने यह बात सुनकर सिर झुका लिया।
उन्हें समझ आ गया कि राजा बनने का मतलब ताज पहनना नहीं, बल्कि लोगों के आँसू पोंछना है।
लेकिन अगर यही कहानी आज के कुछ नेताओं को सुनाई जाए, तो शायद वे हँसते हुए कहें –
“राजा का काम आँसू पोंछना नहीं, कैमरे के सामने मुस्कुराना है।”
आज की राजनीति में शायद नया सिद्धांत चल रहा है —
पहले संकट पैदा करो, फिर मंच पर चढ़कर उसे “ऐतिहासिक उपलब्धि” घोषित कर दो।
महाभारत के समय का राजा युद्ध जीतकर रो रहा था,
आज का कुछ नेता कभी-कभी युद्ध हो या संकट — उसके बाद भी तालियाँ बजवा रहा होता है।
तब राजा अपने मन में अपराध-बोध लेकर चलता था,
आज कुछ नेता अपने भाषणों में ऐसा विश्वास लेकर चलते हैं कि
अगर हार भी जाएँ, तो अगले दिन उसे भी “जनता का जनादेश” बता दें।
युधिष्ठिर को अपनी जीत पर अपराध-बोध था,
आज कुछ नेताओं को अपनी गलतियों पर भी गर्व हो जाता है —
क्योंकि राजनीति में गलती भी कभी-कभी “रणनीति” बन जाती है।
भीष्म पितामह ने कहा था –
“राजा का धर्म है कि वह प्रजा के दुख को अपना दुख समझे।”
लेकिन आज की राजनीति शायद यह नया पाठ पढ़ाती है –
“प्रजा का दुख भी एक अवसर है…
अगले चुनाव के भाषण के लिए।”
कभी-कभी लगता है कि महाभारत का युग ज्यादा ईमानदार था।
तब युद्ध तलवारों से होते थे, इसलिए घाव दिखाई देते थे।
आज के युद्ध शब्दों और प्रचार से होते हैं, इसलिए घाव दिखाई नहीं देते — बस समाज के भीतर धीरे-धीरे गहराते जाते हैं।
इतिहास की विडंबना भी बड़ी दिलचस्प है।
जो नेता इतिहास से सीखने की बात करते हैं, वे अक्सर इतिहास को मंच की सजावट बनाकर छोड़ देते हैं।
महाभारत की कहानी आज भी शायद यही कहती है —
राजनीति की असली परीक्षा युद्ध जीतने में नहीं, बल्कि युद्ध के बाद लोगों के टूटे जीवन को जोड़ने में होती है।
क्योंकि इतिहास ने कई बार साबित किया है कि
जो राजा युद्ध जीतकर भी इंसानियत हार जाते हैं,
उनकी जीत भी अंत में हार ही बन जाती है।
और शायद इसलिए महाभारत आज भी धीरे से याद दिलाता है —
“राजा बनने से पहले मनुष्य बनना सीखो…
क्योंकि ताज सिर पर हो सकता है,
पर इतिहास दिल को ही तौलता है।”

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