“बजरी का काला सच: सरकारी पर्ची से चलता अवैध परिवहन”
अजमेर: अजमेर सहित राजस्थान में अवैध बजरी परिवहन अब चोरी-छिपे नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेज़ की ढाल लेकर खुलेआम हो रहा है। खान एवं भू-विज्ञान विभाग द्वारा जारी की जा रही रवानगी पर्चियां खुली मौत का औज़ार बन चुकी हैं, जिनके सहारे बजरी माफिया कानून को चुनौती देता हुआ शहरों के भीतर तक पहुँच रहा है।

23 जनवरी की सुबह इसी व्यवस्था की पोल तब खुली, जब रियाबाड़ी (नागौर) से निकला बजरी से भरा एक डंपर बिना नम्बर प्लेट के सुबह करीब ,9.00 बजे अजमेर के वैशाली नगर जैसे रिहायशी क्षेत्र में आया,डंपर ड्राइवर के पास जो दस्तावेज़ था, वह राजस्थान सरकार के खान एवं भू-विज्ञान विभाग द्वारा जारी e-Transit Pass था। इस रवानगी पर्ची में वाहन संख्या RJ12 GA 2552, ट्रांजिट पास नंबर SSWZ1038257258, खनिज Masonry Stone (बजरी), नेट वजन 10.57 मीट्रिक टन, ट्रेडर वीर तेजा कोन क्रशर्स, स्थान बाड़ी घाटी, रियाबाड़ी (नागौर) और अनुमानित दूरी 150 किलोमीटर दर्ज है। पर्ची की वैधता उसी दिन दोपहर 12:38 बजे तक बताई गई है।
सवाल उठता है कि रवानगी पर्ची सुबह 5.45 मिनट की डंपर की गति सीमा 40/50 किलोमीटर भी मानी जाए तो उसे 150 किलोमीटर का सफर बिना रुके एक ही स्पीड में चलने पर करीब 3 से 4 घंटे लग जाएंगे । फिर यह डंपर माइंस से ऐसे कौनसे रास्ते होते हुए अजमेर आया जहा उसे मात्र दो से ढाई घंटे ही लगे? यही रवानगी पर्ची अपने आप में सबसे बड़ा सवाल भी खड़ा करती है।
इस सरकारी दस्तावेज़ में कहीं भी यह दर्ज नहीं है कि बजरी आखिर जा कहां रही है। न किसी निर्माण साइट का नाम, न गोदाम का पता, न बिल्डर या क्रेता का विवरण। जब गंतव्य ही दर्ज नहीं, तो यह कैसे तय होगा कि बजरी एक ही फेरे में खाली हुई या उसी पर्ची पर पूरे दिन कई चक्कर लगाए गए?
हैरानी की बात यह है कि रवानगी पर्ची में एक पर्ची पर कितने फेरे मान्य हैं, इसका भी कोई उल्लेख नहीं। न वापसी का रिकॉर्ड, न खाली लौटने की पुष्टि। नतीजा यह कि एक पर्ची पूरे दिन का लाइसेंस बन जाती है और बजरी माफिया उसी कागज़ को दिखाकर बार-बार शहर में प्रवेश करता रहता है।इसी पर्ची की आड़ में डंपर नो-एंट्री समय में रिहायशी इलाकों तक कैसे पहुंचा, यह सवाल और भी गंभीर है। रीजनल कॉलेज चौराह पर लगे सीसीटीवी कैमरों के रहते ऐसा कैसे संभव हुआ? क्या कैमरे काम नहीं कर रहे थे, या निगरानी व्यवस्था ने आंखें मूंद रखी थीं?
जब इस संबंध में थाना क्रिश्चियनगंज से संपर्क किया गया, तो जवाब मिला कि “सुबह 6/7 बजे तक ही डंपर वाहनों को शहर में प्रवेश की अनुमति है, जानकारी लेकर कार्रवाई की जाएगी।” सवाल यह है कि जब नियम स्पष्ट हैं, तो डंपर को रोका क्यों नहीं गया? कार्रवाई हमेशा बाद में ही क्यों याद आती है?
जमीनी हकीकत यह भी है कि डंपर पर नंबर प्लेट तक नहीं लगी थी । तो क्या रवानगी पर्ची दिखाते ही वाहन को आगे बढ़ने दिया जाता है ?यही कारण है कि हर बार डंपरों से कुचलकर हुई मौतों के बाद जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती और तथाकथित वैध दस्तावेज़ माफियाओं की ढाल बन जाते हैं। पुलिस भी रवानगी पर्ची के बाद सभी जांच से अपना ध्यान हटा लेती है ।
इस पूरे तंत्र में सबसे बड़ी खामी माइनिंग विभाग के जिम्मेदारों की दिखाई देती है जो रवानगी पर्ची को अधूरी जानकारी के बावजूद प्रमाणित कर देती है। अधूरी जानकारी, बिना गंतव्य, बिना फेरे की सीमा और बिना रूट-ट्रैकिंग के जारी की जा रही ये पर्चियां न केवल अवैध परिवहन को बढ़ावा दे रही हैं, बल्कि पुलिस और प्रशासन के लिए भी स्थायी सिरदर्द बन चुकी हैं।
अगर सरकार वास्तव में अवैध बजरी परिवहन रोकना चाहती है, तो रवानगी पर्ची में पूरा गंतव्य विवरण, एक पर्ची-एक फेरा का डिजिटल रिकॉर्ड, जीपीएस आधारित रूट और समय की सख़्त निगरानी अनिवार्य करनी होगी। साथ ही नो-एंट्री उल्लंघन और बिना नंबर प्लेट वाहनों पर तात्कालिक जब्ती और आपराधिक कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।
जब तक यह व्यवस्था नहीं बदली जाएगी, तब तक अवैध बजरी परिवहन यूं ही चलता रहेगा और हर हादसे के बाद वही सवाल गूंजता रहेगा—गलती किसकी थी?
अब देखना यह है कि इस खबर के बाद भी प्रशासन अपनी इन खामियों को दूर करेगा या उजड़ते परिवारों की चीखें टेबल के नीचे दबा कर अपनी शान समझेगा

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