निजता बनाम प्लेटफॉर्म शक्ति: WhatsApp, Meta और संविधान की कसौटी

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नई दिल्ली । (एजेंसी) WhatsApp की 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी केवल एक तकनीकी विवाद नहीं, बल्कि भारत में डिजिटल अधिकारों की दिशा तय करने वाला संवैधानिक संकेत है। “संविधान नहीं मान सकते तो देश छोड़ दें” जैसी कड़ी टिप्पणी यह दर्शाती है कि अदालत अब वैश्विक तकनीकी कंपनियों को भारतीय संवैधानिक ढांचे के बाहर काम करने की छूट देने के मूड में नहीं है।
यह मामला भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) द्वारा लगाए गए 213.14 करोड़ रुपये के जुर्माने से जुड़ा है, जिसे NCLAT ने बरकरार रखा था। CCI का निष्कर्ष स्पष्ट था—WhatsApp ने अपने दबदबे का इस्तेमाल करते हुए यूजर्स को “लेना है तो लो” मॉडल के तहत डेटा शेयरिंग के लिए मजबूर किया, जो प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 का उल्लंघन है। सवाल केवल डेटा संग्रह का नहीं, बल्कि सहमति की वैधता का है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान जिस मूल बिंदु पर जोर दिया, वह है सूचित और स्वतंत्र सहमति। अदालत का यह कहना कि जटिल प्राइवेसी शर्तें आम नागरिक की समझ से बाहर हैं, डिजिटल युग में सहमति की पूरी अवधारणा पर पुनर्विचार की मांग करता है। जब विकल्प सीमित हों और सेवा तक पहुंच डेटा साझा करने से जुड़ी हो, तो सहमति स्वैच्छिक कैसे मानी जा सकती है?
कोर्ट की टिप्पणी निजता के उस मौलिक अधिकार की याद दिलाती है, जिसे पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) में मान्यता दी गई थी। तकनीकी मंचों द्वारा टारगेटेड विज्ञापन और व्यवहारिक प्रोफाइलिंग के लिए डेटा उपयोग, निजता और गरिमा दोनों पर असर डालता है।
Meta का यह तर्क कि मैसेज एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड हैं, मुद्दे के मूल से ध्यान हटाने का प्रयास प्रतीत होता है। प्रश्न संदेश पढ़ने का नहीं, बल्कि मेटाडाटा और यूजर व्यवहार के व्यावसायिक उपयोग का है।
9 फरवरी को आने वाला सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश यह तय करेगा कि भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही बाजार शर्तों से चलेगी या संविधान की कसौटी पर। यह फैसला केवल WhatsApp या Meta तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे डिजिटल इकोसिस्टम के लिए एक निर्णायक मिसाल बनेगा।

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