अविवाहित पोती को मिला,सीमित संपत्ति का पूर्ण स्वामित्व : दिल्ली हाईकोर्ट

Spread the love

नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को मजबूती देते हुए कहा है कि पहले से मृत बेटे की अविवाहित नाबालिग बेटी के भरण-पोषण का दायित्व “पहले से मौजूद अधिकार” है, जिसके आधार पर उसे मिली सीमित संपत्ति हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के तहत पूर्ण स्वामित्व में परिवर्तित हो जाएगी।
जस्टिस पुरुशैन्द्र कुमार कौरव ने यह टिप्पणी नई दिल्ली के कस्तूरबा गांधी मार्ग स्थित संपत्ति से जुड़े एक बंटवारे के मुकदमे में की। यह मुकदमा मूल मालिक के पहले से मृत बेटे की 79 वर्षीय अविवाहित बेटी ने दायर किया था। प्रतिवादी, जो मालिक के अन्य जीवित बेटों के वंशज थे, ने तर्क दिया कि महिला को 1956 की गिफ्ट डीड के तहत केवल जीवन-कालीन अधिकार मिला था, जिसे पूर्ण स्वामित्व में नहीं बदला जा सकता।
कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि शास्त्रीय हिंदू कानून महिलाओं की सुरक्षा और भरण-पोषण के लिए निरंतर पारिवारिक दायित्व को मान्यता देता है। यह जिम्मेदारी किसी एक अभिभावक की मृत्यु के साथ समाप्त नहीं होती, बल्कि परिस्थितियों में निकटतम रिश्तेदारों पर स्थानांतरित हो जाती है।
याज्ञवल्क्य स्मृति का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यदि पिता उपलब्ध न हो, तो परिवार के अन्य सगोत्र संबंधी महिला के भरण-पोषण के लिए बाध्य हो सकते हैं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले V. Tulasamma बनाम Sesha Reddy पर भरोसा करते हुए दोहराया कि ऐसा कोई दस्तावेज़, जो केवल पहले से मौजूद अधिकार की पहचान करता है, महिला के संपत्ति अधिकारों को सीमित नहीं कर सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में सीमा-काल तब तक शुरू नहीं होता, जब तक महिला के अधिकारों से स्पष्ट रूप से इनकार न किया जाए। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भविष्य में महिलाओं से जुड़े संपत्ति विवादों में एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *