महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से परेशान युवा; फ्रांस से सर्बिया तक उठ रही बदलाव की आवाज, दुनिया में चर्चा—क्या यह ‘अरब स्प्रिंग 2.0’ की शुरुआत है?
नई दिल्ली /अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट | (प्र.सा.)
दुनिया को लोकतंत्र और विकास का रास्ता दिखाने वाले यूरोप में आज युवाओं का गुस्सा सड़कों पर दिखाई दे रहा है। फ्रांस, इटली, पोलैंड, ग्रीस और सर्बिया जैसे देशों में लोग अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। कहीं महंगाई ने आम आदमी का बजट बिगाड़ दिया है, कहीं बेरोजगारी युवाओं के भविष्य पर सवाल खड़े कर रही है, तो कहीं भ्रष्टाचार और सरकारों के अधूरे वादों के खिलाफ आवाज बुलंद हो रही है।
यूरोप में उठती इन आवाजों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या युवाओं का यह गुस्सा किसी बड़े बदलाव की शुरुआत है? क्या दुनिया एक बार फिर वैसी ही जनक्रांति की आहट सुन रही है, जैसी वर्ष 2010-11 में अरब देशों में देखने को मिली थी?
महंगाई और बेरोजगारी ने बढ़ाई युवाओं की परेशानी
यूरोप के कई देशों में युवाओं के सामने रोजगार और मकान सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी मिलना और नौकरी मिलने के बाद अपने खर्च पूरे करना आसान नहीं रह गया है।
महंगे किराए, बढ़ती कीमतों और आर्थिक परेशानियों ने युवाओं की चिंता बढ़ा दी है। यही वजह है कि अब युवा केवल रोजगार की मांग नहीं कर रहे, बल्कि ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें उन्हें सम्मान के साथ जीवन जीने का अवसर मिले।
युवाओं का यह असंतोष अब सड़कों पर दिखाई दे रहा है। कई जगह प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की खबरें भी सामने आई हैं।
इटली में विरोध से बिगड़ रहे हालात
इटली में विरोध-प्रदर्शनों के बीच बोलोग्ना में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पों की खबरें सामने आई हैं। कुछ घटनाओं में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और बैरिकेड्स जलाने का भी उल्लेख किया गया है।
दूसरी ओर, ईंधन की बढ़ती कीमतों के विरोध में ट्रक चालकों की हड़ताल ने आर्थिक परेशानियां बढ़ा दी हैं।
ईंधन की कमी और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका ने सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। आम जनता की मांग है कि सरकार बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण के लिए तत्काल कदम उठाए।
पोलैंड में सरकार से वादों का हिसाब मांग रहे लोग
पोलैंड में लोग विधायी सुधारों और प्रजनन अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर प्रदर्शन कर रहे हैं।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क और संसद को चुनाव के दौरान किए गए वादे पूरे करने चाहिए।
यह आंदोलन सरकार के सामने एक सीधा सवाल रखता है—चुनाव के समय किए गए वादे आखिर कब पूरे होंगे?
ग्रीस में शिक्षा और मकान को लेकर आंदोलन
ग्रीस में छात्र और शिक्षक बेहतर शिक्षा व्यवस्था की मांग को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं।
प्रभा साक्षी की रिपोर्ट के अनुसार, एथेंस में करीब 10 हजार लोगों ने मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि शिक्षा का बजट बढ़ाया जाए, स्कूलों की हालत सुधारी जाए, शिक्षकों का वेतन बढ़ाया जाए और युवाओं को सस्ते मकान उपलब्ध कराने की व्यवस्था हो।
युवाओं की परेशानी केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है। शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार और मकान हासिल करना भी उनके लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
सर्बिया में भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्रों की लड़ाई
यूरोप में जारी आंदोलनों के बीच सर्बिया का छात्र आंदोलन खास चर्चा में है।
नवंबर 2024 में नोवी साद रेलवे स्टेशन की छत गिरने से 16 लोगों की मौत हो गई थी। इस हादसे के बाद छात्रों ने जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई और निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार रोकने की मांग उठाई।
छात्रों का आरोप है कि भ्रष्टाचार के कारण निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और सरकारी जवाबदेही कमजोर हुई है।
धीरे-धीरे इस आंदोलन को आम नागरिकों, किसानों और शिक्षकों का समर्थन मिलने लगा।
प्रभा साक्षी की रिपोर्ट के मुताबिक, अब यह आंदोलन चुनावी राजनीति में भी अपनी ताकत दिखाने की तैयारी कर रहा है। ‘स्टूडेंट्स विन’ नाम से 250 उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने का उल्लेख किया गया है। इनमें प्रोफेसर, कलाकार, किसान और एक लोकप्रिय रैपर भी शामिल बताए गए हैं।
यह घटनाक्रम बताता है कि जब जनता का असंतोष बढ़ता है, तो आंदोलन केवल विरोध तक सीमित नहीं रहता। वह राजनीतिक बदलाव की मांग भी बन सकता है।
क्या यूरोप में फिर उठेगी जनक्रांति?
वर्ष 2010-11 में अरब देशों में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक असंतोष के खिलाफ बड़े जनआंदोलन हुए थे। इन्हें ‘अरब स्प्रिंग’ कहा गया।
अब यूरोप के कई देशों में भी युवाओं की नाराजगी सामने आ रही है। हालांकि, यूरोप के मौजूदा आंदोलनों को अरब स्प्रिंग की पुनरावृत्ति कहना अभी जल्दबाजी होगी। हर देश की परिस्थितियां अलग हैं और आंदोलनों के मुद्दे भी अलग-अलग हैं।
लेकिन इन घटनाओं के बीच एक बात समान दिखाई देती है—युवा बेहतर भविष्य चाहते हैं और सरकारों से जवाब मांग रहे हैं।
सरकारों के लिए चेतावनी, जनता को चाहिए जवाब
यूरोप में उठ रही विरोध की आवाजें दुनिया की सरकारों के लिए एक संदेश हैं।
जनता को केवल चुनावी वादे नहीं, बल्कि रोजगार, शिक्षा, आवास और भ्रष्टाचार से मुक्ति जैसे मुद्दों पर ठोस काम चाहिए।
जब युवाओं को अपने भविष्य को लेकर चिंता होने लगे और सरकारी व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ने लगे, तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है।
यूरोप में आगे क्या होगा, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन मौजूदा घटनाक्रम ने दुनिया के सामने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—
क्या सरकारें युवाओं की आवाज सुनकर व्यवस्था में सुधार करेंगी, या सड़कों पर उठता यह गुस्सा आने वाले दिनों में बड़े राजनीतिक बदलाव की वजह बनेगा?
