डिजिटल भुगतान की चमक के पीछे शुल्क का सवाल, ‘डिजिटल टोल नाके’ पर तीखा कटाक्ष

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कैशलेस व्यवस्था को लेकर उठे सवालों पर व्यंग्यकार आशीष तिवारी ‘निर्मल’ ने साधा निशाना, बोले—सुविधा की कीमत आखिर कौन चुकाएगा?

रीवा। डिजिटल भुगतान व्यवस्था ने देश के रोजमर्रा के लेन-देन का तरीका बदल दिया है। छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी तक QR कोड और ऑनलाइन भुगतान आज आम जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। इसी बदलती तस्वीर और डिजिटल लेन-देन से जुड़ी शुल्क व्यवस्था की चर्चाओं को केंद्र में रखकर लालगांव निवासी व्यंग्यकार, विचारक एवं कवि आशीष तिवारी ‘निर्मल’ ने अपने ताजा कटाक्ष में व्यवस्था पर तीखा सवाल खड़ा किया है।अपने व्यंग्य ‘डिजिटल इंडिया का डिजिटल टोल नाका’ में तिवारी ने उस दौर को याद किया है, जब देशभर में कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए दुकानों और छोटे कारोबारियों तक डिजिटल भुगतान के विकल्प पहुंचाए गए थे। पान की दुकान, चाय की गुमटी, ऑटो और सब्जी के ठेले तक QR कोड पहुंचने को उन्होंने डिजिटल बदलाव की बड़ी तस्वीर के रूप में प्रस्तुत किया है।व्यंग्यकार का कटाक्ष यहीं से धार पकड़ता है। उनका सवाल है कि जिस डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लंबे समय तक आसान और सुविधाजनक विकल्प के रूप में अपनाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया गया, यदि भविष्य में इसके इस्तेमाल से जुड़ी लागत या शुल्क बढ़ता है तो उसका वास्तविक भार किस पर पड़ेगा।तिवारी ने दुकानदार पर संभावित शुल्क का तर्क सामने रखते हुए व्यंग्यात्मक अंदाज में पूछा है कि कारोबार की लागत बढ़ने की स्थिति में क्या उसका असर अंततः वस्तुओं की कीमतों पर नहीं पड़ सकता। उनके मुताबिक ग्राहक से सीधे शुल्क नहीं लिया जाए, तब भी बाजार में कीमतों के माध्यम से उसका अप्रत्यक्ष प्रभाव दिखाई देने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।व्यंग्य में NPCI और डिजिटल भुगतान के संचालन की लागत का संदर्भ लेते हुए भी सवाल उठाया गया है। हालांकि यह पूरा लेख व्यंग्य की शैली में है और इसमें उठाए गए कई दावे व आंकड़े स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य के बजाय व्यंग्यात्मक तर्क के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।तिवारी ने डिजिटल भुगतान की तुलना ऐसी सुविधा से की है, जिसकी आदत पहले लोगों को सहज रूप से पड़ जाती है और बाद में उसी सुविधा की लागत पर बहस शुरू होती है। उनका कटाक्ष है कि कैशलेस व्यवस्था को अपनाने के बाद यदि डिजिटल लेन-देन पर शुल्क की व्यवस्था आती है तो उपभोक्ता को यह समझना होगा कि भुगतान की वास्तविक लागत आखिरकार कहां जाकर जुड़ती है।व्यंग्यकार ने अपने लेख के माध्यम से डिजिटल भुगतान की उपयोगिता पर सवाल खड़ा करने के बजाय उसके आर्थिक प्रभाव और शुल्क व्यवस्था की पारदर्शिता को बहस का विषय बनाया है। उनका संदेश है कि तकनीक सुविधा देती है, लेकिन सुविधा की कीमत और उसका भार किस वर्ग पर पड़ता है, इस पर सार्वजनिक चर्चा भी उतनी ही जरूरी है।लेख के अंत में तिवारी का कटाक्ष QR कोड से भुगतान करने वाले आम नागरिक की ओर लौटता है—डिजिटल भुगतान करते समय केवल स्क्रीन पर दिखाई देने वाली रकम ही नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की लागत को भी समझने की जरूरत है। व्यंग्यकार/विचारक/कवि आशीष तिवारी ‘निर्मल’, लालगांव, रीवा ने अपने इस कटाक्ष के जरिए डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लेकर चल रही चर्चाओं पर व्यंग्यात्मक अंदाज में एक ऐसा सवाल छोड़ा है, जिसका जवाब तकनीक से ज्यादा उसकी आर्थिक संरचना में तलाशना होगा।

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