अजमेर। ब्यावर में इस बार ऐतिहासिक बादशाह मेला इस वर्ष उस समय शोकसभा में बदल गया, जब पारंपरिक ‘बादशाह’ की भूमिका निभा रहे चन्द्रप्रकाश अग्रवाल का अचानक निधन हो गया। होली के अवसर पर आयोजित ‘जश्न-ए-गुलाल’ कार्यक्रम के दौरान हजारों मेलार्थियों की मौजूदगी में यह हृदयविदारक घटना घटित हुई।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बादशाह की पारंपरिक सवारी नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई महादेव जी की छत्री पहुंची। पूरे मार्ग में “आओ बादशाह… आओ बादशाह…” के उद्घोष, गुलाल की बौछार और ढोल-नगाड़ों की गूंज से वातावरण उत्सवमय था। परंपरा के अनुसार, बादशाह बने चन्द्रप्रकाश अग्रवाल ट्रक पर विराजमान होकर अपनी ‘रियाया’ पर गुलाल रूपी ‘खर्ची’ लुटा रहे थे।
इसी दौरान उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। तत्काल व्यवस्था के तहत उन्हें एम्बुलेंस से अमृतकौर अस्पताल ले जाया गया। जहां डॉक्टरों ने आधिकारिक रूप से हृदयाघात के चलते उनके निधन की पुष्टि कर दी।
यह समाचार मिलते ही मेले का उल्लास शोक में बदल गया। बाजार में लगे डीजे बंद कर दिए गए, लाइव प्रसारण रोक दिया गया और मेलार्थियों ने गुलाल की थैलियां एक ओर रख दीं। जिला कलेक्टर कार्यालय पर परंपरानुसार खेली जाने वाली अंतिम गुलाल भी इस बार नहीं खेली गई। केवल औपचारिक रूप से फरमान पढ़कर कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। प्रशासन ने तत्परता दिखाते हुए मेला तत्काल प्रभाव से रोक दिया।
बादशाह मेले का इतिहास और परंपरा
ब्यावर का बादशाह मेला होली के अवसर पर मनाया जाने वाला एक अद्वितीय सांस्कृतिक आयोजन है, जिसकी परंपरा लगभग डेढ़ शताब्दी पुरानी मानी जाती है। यह आयोजन सांप्रदायिक सौहार्द और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। परंपरा के अनुसार, नगर के प्रतिष्ठित व्यापारी या समाजसेवी को ‘बादशाह’ की उपाधि देकर एक दिन के लिए प्रतीकात्मक शाही दरबार सजाया जाता है।
बादशाह की सवारी नगर भ्रमण करती है और वह अपनी ‘प्रजा’ पर गुलाल उछालकर उत्सव में सहभागी होता है। अंत में कलेक्टर कार्यालय पर प्रतीकात्मक ‘फरमान’ सुनाया जाता है, जिसमें सामाजिक संदेश और जनहित के मुद्दों को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया जाता है। इस आयोजन का उद्देश्य सामाजिक बुराइयों पर कटाक्ष करना, लोक परंपराओं को जीवित रखना और सामूहिक उल्लास के माध्यम से भाईचारे को सुदृढ़ करना है।
इतिहास में इससे पूर्व एक बार एसडीएम कार्यालय परिसर में गुलाल की थैली शॉर्ट सर्किट से आग पकड़ लेने की घटना भी हुई थी, किंतु तत्काल नियंत्रण पा लिया गया था। परंतु इस वर्ष की घटना ने नगर को स्तब्ध कर दिया है।
चन्द्रप्रकाश अग्रवाल का इस प्रकार उत्सव के मध्य निधन होना नगर के इतिहास में अभूतपूर्व और हृदय विदारक घटना के रूप में दर्ज हो गया है। कुछ घंटों पूर्व जिस व्यक्तित्व को उल्लासपूर्वक ट्रक पर विराजमान कर बादशाह की उपाधि दी गई, वही बादशाह अपनी अंतिम यात्रा पर अनायास निकल पड़े—यह विडंबना पूरे नगर को व्यथित कर गई।
नगरवासियों, व्यापारिक संगठनों और सामाजिक संस्थाओं ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। ब्यावर का ‘जश्न-ए-गुलाल’ इस वर्ष सदा के लिए एक गमगीन स्मृति बन गया।
