नामांकन वापसी के बाद अजमेर की बिसात पर नई चालें: 80 वार्ड, कहीं बग़ावत की आग तो कहीं सन्नाटे में सौदेबाज़ी
विशेष पड़ताल / अजमेर ब्यूरो
सियासत के खेल में जब पर्चे खींचे जाते हैं, तो कई बार चेहरे बेनकाब होते हैं और कई बार बंद कमरों की सौदेबाज़ी बाहर निकलती है। अजमेर नगर निगम के 80 वार्डों की चौसर पर नामांकन वापसी का वक्त बीतने के साथ ही वही हुआ—चुनावी धुंध छँटी और सामने आ गया असली महाभारत। अब कोई मुगालता नहीं बचा है। मैदान में खड़े चेहरों की गिनती तय हो चुकी है, मगर असली हलचल उन नामों को लेकर है जो कल तक ताल ठोक रहे थे और आज अचानक ग़ायब हो गए।
80 वार्डों में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पूरी फ़ौज उतारकर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाई है, तो दूसरी तरफ़ कांग्रेस 78 सीटों पर सिमटकर दो वार्डों में पहले ही खाली हाथ रह गई। 623 उम्मीदवारों और 787 नामांकनों की काग़ज़ी कसरत के बाद जो छनकर बाहर आया है, उसने शहर के कई वार्डों में तयशुदा समीकरणों की चूलें हिला दी हैं।
वार्ड-2: जब एक इस्तीफ़े ने कांग्रेस के पाँव उखाड़ दिए
इस चुनावी उठापटक का सबसे नाटकीय अध्याय वार्ड नंबर 2 में लिखा गया। यहाँ निर्दलीय ताल ठोक रहे यश जोशी ने जब अपना नामांकन वापस लिया, तो महज़ पर्चा वापस नहीं हुआ—बल्कि वार्ड की चुनावी हवा का रुख़ मुड़ गया।
यश जोशी ने भाजपा प्रत्याशी रितु मामनानी को खुला समर्थन देने का ऐलान किया, और बैकग्राउंड में उनके पिता ब्रजकिशोर जोशी का भाजपा के पाले में खड़ा होना इस पूरे घटनाक्रम की सबसे अहम कड़ी बन गया। पर्दे के पीछे चली इस बिसात ने कांग्रेस के खेमे में अचानक सन्नाटा खींच दिया है। इसे महज़ एक नाम वापसी नहीं, बल्कि कांग्रेस की रणनीति पर सीधे प्रहार के रूप में देखा जा रहा है।
वार्ड-59: धमकियों की सियासत और पुलिस की चौखट
अगर वार्ड-2 में कूटनीति जीती, तो वार्ड 59 में सियासत खुलेआम सड़क पर आ गई। यहाँ नाम वापसी को लेकर जो कुछ घटा, उसने लोकतंत्र की गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप-प्रत्यारोप का स्तर यहाँ तक पहुँचा कि बात मान-मनौव्वल से निकलकर दबाव और सीधी धमकियों तक जा पहुँची।
मुक़दमेबाज़ी शुरू हुई और आख़िरकार पुलिस को बीच में आकर दोनों पक्षों पर पाबंदी की क़ानूनी लगाम कसनी पड़ी। इस वार्ड में वोट बाद में पड़ेंगे, लेकिन सियासी नफ़रत और डर की बिसात पहले ही बिछ चुकी है।
बग़ावत की चिंगारियाँ और युवा चेहरों की दस्तक
दोनों ही पार्टियों के आला नेताओं ने अंतिम क्षणों तक बंद दरवाज़ों के पीछे बाग़ियों के पाँव पकड़े, मान-मनुहार की और समझाइश के तीर चलाए। लेकिन कई वार्डों में बाक़ी रह गए असंतुष्ट चेहरे अब दोनों मुख्य दलों के अधिकृत प्रत्याशियों के गले की फांस बनने जा रहे हैं। बाग़ी अगर दस वोट भी काटते हैं, तो इस निकाय चुनाव में वह हार-जीत का फ़ैसला तय करने के लिए काफ़ी होगा।
वहीं दूसरी ओर, अजमेर की गलियों में इस दफ़ा पारंपरिक नेताओं की जगह युवाओं की नई पौध सीना ताने खड़ी है। न इनके पास किसी बड़े दल का दशकों पुराना ठप्पा है, न कोई खानदानी सियासी विरासत—इनके पास है सोशल मीडिया का आक्रामक हथियार और युवाओं की सीधी टोली। ये नए चेहरे किसी भी पार्टी के स्थापित धुरंधरों का खेल बिगाड़ने का पूरा माद्दा रखते हैं।
आगे की राह: 4 सितंबर से सीधा रण
4 सितंबर को जैसे ही चुनाव चिह्नों की मुहर लगेगी, शहर में लाउडस्पीकरों का शोर और झंडों की जंग तेज़ हो जाएगी। अजमेर का वोटर 9 और 11 सितंबर को मतदान पेटियों में अपना फ़ैसला दर्ज करेगा। 14 सितंबर को मतगणना के साथ पत्ते खुलेंगे, जिसके बाद 21 और 22 सितंबर को महापौर और उपमहापौर के सिंहासन की लड़ाई लड़ी जाएगी।
अब न कोई पर्चा वापस होना है, न किसी को मनाने का वक्त बचा है। अब शहर की जनता की अदालत है—और फ़ैसला इसी अदालत को करना है।
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