रीवा | 16 अक्टूबर 2026 | विशेष रिपोर्ट नारेबाजी के साथ ग्रामीणों ने जताया विरोध, बोले—स्वास्थ्य, पर्यावरण और विस्थापन पर पहले मिले स्पष्ट जवाब; कलेक्टर की समझाइश के अगले दिन भी आंदोलन जारी
रीवा। जिले की सिरमौर तहसील के रोझौही क्षेत्र में प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर ग्रामीणों का विरोध अब सड़कों पर दिखाई देने लगा है। शुक्रवार, 16 अक्टूबर को ग्रामीणों ने बद्रीढाबा से साधू बाबा तक रैली निकालकर नारेबाजी की और प्रस्तावित परमाणु परियोजना के प्रति अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। रैली के जरिए ग्रामीणों ने साफ संदेश देने की कोशिश की कि परियोजना को लेकर उनकी चिंताएं अभी समाप्त नहीं हुई हैं और वे अपने सवालों के जवाब चाहते हैं।गौरतलब है कि इससे एक दिन पहले, 15 अक्टूबर को रीवा कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी ने प्रस्तावित परियोजना स्थल का दौरा कर ग्रामीणों से संवाद किया था। प्रशासन की ओर से परियोजना के संभावित लाभों और विकास से जुड़े पहलुओं को समझाने का प्रयास किया गया, लेकिन अगले ही दिन निकली रैली ने यह स्पष्ट कर दिया कि क्षेत्र में परियोजना को लेकर असहमति अब भी बनी हुई है।
समझाइश के बाद भी क्यों नहीं थमा विरोध?
ग्रामीणों की चिंता केवल किसी परियोजना के निर्माण तक सीमित नहीं है। उनके सामने अपनी जमीन, परिवारों के भविष्य, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से जुड़े सवाल हैं। ग्रामीणों का कहना है कि किसी भी बड़ी औद्योगिक परियोजना पर आगे बढ़ने से पहले प्रभावित क्षेत्र के लोगों की आशंकाओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर ग्रामीणों के मन में कई सवाल हैं। यदि परियोजना स्थापित होती है, तो स्थानीय आबादी की स्वास्थ्य सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित की जाएगी? पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन कैसे होगा? संभावित विस्थापन की स्थिति में प्रभावित परिवारों के अधिकारों और पुनर्वास की क्या व्यवस्था होगी? इन सवालों पर स्पष्ट और विश्वसनीय जानकारी मिलने की मांग आंदोलन का प्रमुख हिस्सा बनी हुई है।ग्रामीणों की आपत्तियों के बीच प्रशासन के सामने अब संवाद को आगे बढ़ाने और प्रत्येक सवाल का तथ्यात्मक जवाब उपलब्ध कराने की चुनौती है।
बोरहोल स्टडी पर भी ग्रामीणों की आपत्ति
विरोध का एक अहम पहलू प्रस्तावित परियोजना से जुड़ी शुरुआती भू-तकनीकी जांच यानी बोरहोल स्टडी भी है। ग्रामीण पहले से ही इस प्रक्रिया को लेकर आपत्ति जता चुके हैं। उनका कहना है कि परियोजना की दिशा, संभावित प्रभावों और उनकी आपत्तियों पर स्थिति स्पष्ट होने तक संबंधित गतिविधियों को लेकर उनकी चिंताओं का समाधान किया जाना चाहिए।यह विवाद अब केवल परियोजना के संभावित निर्माण तक सीमित नहीं रह गया है। स्थानीय स्तर पर सहमति, जानकारी की पारदर्शिता और ग्रामीणों की भागीदारी भी चर्चा के केंद्र में आ गई है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन और परियोजना से जुड़े जिम्मेदार पक्ष ग्रामीणों के सवालों का समाधान किस तरह करते हैं।
विकास का दावा और स्थानीय चिंताएं—दोनों पर जवाब जरूरी
बड़ी ऊर्जा परियोजनाओं को लेकर विकास, बिजली उत्पादन और रोजगार जैसे पहलुओं पर चर्चा होती है। दूसरी ओर, स्थानीय समुदायों के लिए जमीन, आजीविका, स्वास्थ्य सुरक्षा और पर्यावरण भी उतने ही महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। रोझौही में जारी विरोध ने इन मुद्दों को एक बार फिर सामने ला दिया है।ग्रामीणों की मांग है कि उन्हें केवल परियोजना के संभावित फायदे ही नहीं, बल्कि जोखिमों, सुरक्षा मानकों, पर्यावरणीय प्रभावों और पुनर्वास संबंधी व्यवस्थाओं की भी स्पष्ट जानकारी दी जाए। परमाणु ऊर्जा से जुड़ी किसी भी परियोजना के मामले में सुरक्षा संबंधी तथ्यों और नियामकीय प्रक्रियाओं को पारदर्शी ढंग से सामने रखना महत्वपूर्ण होता है।
अब प्रशासन की अगली पहल पर निगाहें
16 अक्टूबर को बद्रीढाबा से साधू बाबा तक निकाली गई रैली ने यह संकेत दिया है कि रोझौही में परियोजना को लेकर ग्रामीणों की असहमति अभी कायम है। कलेक्टर के दौरे के अगले दिन हुए इस प्रदर्शन के बाद अब आगे की बातचीत, ग्रामीणों की आपत्तियों पर कार्रवाई और परियोजना से संबंधित आधिकारिक जानकारी पर नजर रहेगी।फिलहाल ग्रामीणों की ओर से विरोध जारी है। वहीं, परियोजना के संभावित प्रभावों, बोरहोल स्टडी की मौजूदा स्थिति और ग्रामीणों की मांगों पर प्रशासन तथा संबंधित कंपनी का विस्तृत आधिकारिक पक्ष सामने आना शेष है।रोझौही का सवाल अब सिर्फ एक परियोजना का नहीं, बल्कि विकास की प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की चिंताओं, सुरक्षा और सहभागिता को किस तरह जगह दी जाती है, इसका भी है। आने वाले दिनों में प्रशासन की पहल और ग्रामीणों के साथ होने वाली बातचीत इस पूरे मामले की अगली दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
