एक पिता का खुला बयान—तीन साल बाद भी सवाल जिंदा हैं, जवाब बाकी है
संपादकीय | खबर वन न्यूज
7 अक्टूबर… मेरे जीवन की वह तारीख है, जिसे कैलेंडर से मिटाया नहीं जा सकता।
7 अक्टूबर 2023 को मेरा बेटा चिराग मुझसे छिन गया।
उस दिन सिर्फ एक घर का बेटा नहीं गया था। एक पिता का संसार बदल गया, एक परिवार की हंसी खामोश हो गई और मेरे सामने ऐसा सवाल खड़ा हो गया, जिसका जवाब मैं आज भी तलाश रहा हूं—आखिर चिराग क्यों गया? परिस्थितियां क्या थीं? और उसके पीछे का पूरा सच क्या है?
मैंने अपना संघर्ष कभी छिपकर नहीं लड़ा। मैंने जो देखा, जो महसूस किया और जिन परिस्थितियों को लेकर मेरे मन में सवाल पैदा हुए, उन्हें सामने रखने का साहस किया। आज तीन साल बाद भी मेरा सवाल वही है—क्या हर सवाल पूछने वाले को चुप करा देना ही व्यवस्था है?
24 अक्टूबर 2022 को मैंने आने वाले समय को लेकर जो भविष्यवाणी की थी, वह आज भी मेरे मन में है। मैंने तब भी समय की करवट को महसूस किया था और आज भी अपनी आध्यात्मिक साधना तथा विश्वास के आधार पर आने वाले समय को महत्वपूर्ण मानता हूं।
10 अक्टूबर से 29 नवंबर तक का समय मेरे लिए केवल तारीखों का अंतराल नहीं है। मैं इसे आने वाले घटनाक्रमों की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानता हूं।
लेकिन एक बात बिल्कुल स्पष्ट है—
मैं किसी के खिलाफ हिंसा नहीं चाहता।
मैं किसी के घर का चिराग बुझते नहीं देखना चाहता।
मैं केवल सत्य का प्रकाश चाहता हूं।
जिन लोगों पर मुझे अपने बेटे को खोने के मामले में संदेह या आरोप हैं, उनका फैसला मैं नहीं करूंगा। फैसला कानून और सत्य करेंगे।
आज मैं उन लोगों से भी सवाल पूछता हूं जो धर्म के नाम पर बड़े-बड़े मंच लगाते हैं, राम के नाम के नारे लगाते हैं, भंडारे कराते हैं और युवाओं को धर्म का पाठ पढ़ाते हैं—
क्या धर्म केवल मंच और माइक तक सीमित है?
क्या धर्म अन्याय के सामने चुप रहने का नाम है?
क्या किसी पिता की चीख सत्ता और राजनीति के शोर में दबाई जा सकती है?
अजमेर की जनता सब देखती है।
समय बहुत बड़ा न्यायाधीश है। सत्ता आती-जाती है। पद बदलते हैं। चेहरे बदलते हैं। लेकिन कर्म और सत्य का हिसाब बाकी रहता है।
मैंने अपने बेटे का पिंडदान किया है, लेकिन अपने मन को यह कहकर शांत नहीं कर सकता कि कहानी खत्म हो गई।
मेरे लिए चिराग खत्म नहीं हुआ।
चिराग मेरी स्मृति है।
चिराग मेरा सवाल है।
चिराग मेरे संघर्ष की मशाल है।
मेरी मुक्ति किसी की बर्बादी में नहीं है।
मेरी मुक्ति उस दिन होगी, जब सच सामने आएगा, न्याय मिलेगा और धर्म की स्थापना होगी।
इसलिए मैं आज 7 अक्टूबर को अपने बेटे को सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं देता।
मैं उसे एक संकल्प देता हूं—
चिराग, तुम्हारी रोशनी बुझने नहीं दूंगा।
सच की यह मशाल जलती रहेगी।
और जो सवाल तुम्हारे जाने के बाद खड़े हुए हैं, उनके जवाब आने तक यह संघर्ष जारी रहेगा।
अब फैसला समय करेगा।
अजमेर देख रहा है।
समय देख रहा है।
और ऊपर वाला भी देख रहा है।
**चिराग बुझते नहीं…
वे अंधेरे में रास्ता दिखाने वाली रोशनी बन जाते हैं।**
— देवेंद्र सक्सैना
संपादक, खबर वन न्यूज
