हम विकास कर रहे हैं या जोखिम भी साथ-साथ खड़ा कर रहे हैं? – देवेन्द्र सक्सैना
अक्टूबर की शुरुआत एक सवाल से होनी चाहिए—हम विकास कर रहे हैं या जोखिम भी साथ-साथ खड़ा कर रहे हैं?
देश तेजी से बदल रहा है। चौड़ी सड़कें बन रही हैं, शहरों की सीमाएं फैल रही हैं, गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो रही हैं और तकनीक हमारे जीवन को बदल रही है। सरकारें विकास के आंकड़े गिना रही हैं। तस्वीरें चमक रही हैं। उद्घाटन हो रहे हैं।
लेकिन इस चमक के पीछे एक सवाल लगातार दबा हुआ है—इस विकास के बीच आम आदमी कितना सुरक्षित है?
हर साल बारिश आती है। नदियां उफनती हैं। शहरों में पानी भरता है। कहीं सड़कें टूटती हैं, कहीं घरों में पानी घुसता है और कहीं यातायात घंटों ठप रहता है। फिर कुछ दिनों तक समीक्षा होती है, बयान आते हैं, जिम्मेदारी तय करने की बातें होती हैं और मौसम निकलते ही सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है।
क्या यही हमारी तैयारी है?
प्रकृति को दोष देना आसान है। लेकिन हर आपदा को केवल प्राकृतिक आपदा कह देना सुविधाजनक भी है। तेज बारिश प्रकृति की घटना हो सकती है, लेकिन जलभराव की गंभीरता कई बार हमारी अपनी योजना, निर्माण और जल निकासी व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है।
नदी का रास्ता नदी से पूछे बिना तय नहीं किया जा सकता। नाले को पाटकर शहर को सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता। और प्रकृति के नियमों को नजरअंदाज करके टिकाऊ विकास का दावा नहीं किया जा सकता।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि हम संकट आने से पहले कितनी तैयारी करते हैं।
क्या हर शहर के पास स्पष्ट आपदा प्रबंधन योजना है? क्या संवेदनशील इलाकों की पहचान है? क्या निकासी मार्ग वास्तव में काम करने की स्थिति में हैं? क्या अस्पताल, पुलिस, प्रशासन और स्थानीय निकाय संकट के समय एक कमांड सिस्टम के तहत काम कर सकते हैं? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आम नागरिक को समय रहते सही सूचना मिलती है?
आज हमारे पास मौसम की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक है। सैटेलाइट हैं। डिजिटल अलर्ट हैं। पूर्वानुमान की क्षमता पहले से बेहतर है। फिर भी यदि चेतावनी नागरिक तक तब पहुंचे जब पानी घर में घुस चुका हो, तो तकनीक की उपलब्धता किस काम की?
यह केवल प्रशासन का सवाल नहीं है। यह हमारी विकास नीति का सवाल है।
एक सड़क बनाने से पहले यह पूछना होगा कि बारिश का पानी जाएगा कहां। एक कॉलोनी बसाने से पहले यह देखना होगा कि प्राकृतिक जल निकासी का रास्ता क्या है। किसी नदी या जलस्रोत के आसपास निर्माण की अनुमति देने से पहले यह समझना होगा कि अगली पीढ़ी इसकी कीमत तो नहीं चुकाएगी।
विकास वह नहीं जो उद्घाटन के दिन चमके और पहली बड़ी बारिश में डूब जाए।
विकास वह है जो वर्षों तक टिके, नागरिक को सुरक्षित रखे और संकट आने पर व्यवस्था को संभालने की क्षमता दे।
अक्टूबर की शुरुआत में इसलिए सवाल सीधा होना चाहिए—हमने कितना बनाया, यह बताने से पहले यह बताइए कि हमने कितना सुरक्षित बनाया?
क्योंकि जनता को केवल विकास की तस्वीर नहीं चाहिए।
उसे ऐसा विकास चाहिए, जिसमें उसकी सड़क, उसका घर, उसकी रोजी और उसका जीवन—चारों सुरक्षित हों।
और यही किसी भी जिम्मेदार व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा है।
