बंधक बनाए जाने के आरोपों के बीच रात तक चला मतदान, एक वोट ने तय किया सभापति
अलवर/तिजारा। राजस्थान के निकाय चुनावों में तिजारा नगर परिषद का सभापति चुनाव से पहले पार्षदों की बाड़ेबंदी, दूसरे राज्य की यात्रा, उन्हें रोके जाने के आरोप, पुलिस की भूमिका पर सवाल, अदालत तक पहुंचा विवाद और फिर बस की खिड़की का शीशा तोड़कर पार्षदों के बाहर निकलने का वीडियो ने राजनीति को शर्मशार के दिया । सबसे खास बात यह रही कि जिस चुनाव के लिए इतनी राजनीतिक रस्साकशी हुई, उसका फैसला आखिरकार एक वोट के अंतर से हुआ।
तिजारा नगर परिषद में कुल 35 सदस्य हैं । इनमें 31 निर्दलीय पार्षद हैं। कांग्रेस के एक और भाजपा के तीन पार्षद बताए गए हैं। ऐसे में सभापति पद का पूरा राजनीतिक गणित निर्दलीय पार्षदों के रुख पर टिका हुआ था। यही वजह रही कि चुनाव की तारीख नजदीक आते ही पार्षदों को अपने-अपने खेमे में रखने की कोशिशें तेज हो गईं और तिजारा का स्थानीय चुनाव राजस्थान की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया।
रिपोर्टों के अनुसार कांग्रेस समर्थित निर्दलीय पार्षदों का एक समूह हिमाचल प्रदेश के कसोल गया था। मतदान के लिए वापस लौटते समय हरियाणा के पंचकूला क्षेत्र में विवाद की स्थिति बनी। कांग्रेस की ओर से आरोप लगाया गया कि पार्षदों को मतदान से रोकने का प्रयास किया गया और उन्हें आगे नहीं जाने दिया गया। कुछ पार्षदों की ओर से भी उन्हें रोके जाने के आरोप सामने आए। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी अलग विषय है और पंचकूला पुलिस ने पार्षदों को रोकने या हिरासत में लेने के आरोपों से इनकार किया। ऐसे में पूरे घटनाक्रम की वास्तविक तस्वीर जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकती है।
इसी बीच सामने आया बस की खिड़की का वह वीडियो, जिसने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया। वीडियो में बस के शीशे टूटे दिखाई दे रहे हैं और पार्षद खिड़की के रास्ते बाहर निकलते नजर आते हैं। तस्वीरें अपने आप में घटनाक्रम की गंभीरता बताती हैं, लेकिन शीशा किस परिस्थिति में टूटा और बस के भीतर वास्तव में क्या हुआ, इसका अंतिम निष्कर्ष केवल वीडियो के आधार पर निकालना उचित नहीं होगा। यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक आरोपों से अलग निष्पक्ष जांच की जरूरत महसूस होती है।
इस पूरे विवाद का असर मतदान की समय-सारिणी पर भी पड़ा। रिपोर्टों के अनुसार पार्षदों के पहुंचने में देरी के कारण मतदान का समय बढ़ाया गया और मामला न्यायालय तक पहुंचा। आखिरकार देर रात पार्षद मतदान केंद्र पहुंचे और मतदान की प्रक्रिया पूरी हुई। यानी जिस चुनाव का परिणाम कुछ घंटों में सामने आ जाना चाहिए था, वह घटनाक्रम रात तक खिंच गया। तिजारा में उस दौरान हर गुजरते घंटे के साथ राजनीतिक गणित बदलने की आशंका और चर्चाएं तेज होती रहीं।
इसके बाद मतगणना हुई तो तस्वीर साफ हो गई। कांग्रेस समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी रामावतार सैनी को 18 वोट मिले, जबकि भाजपा समर्थित सुभाष चंद सैनी को 16 वोट मिले। एक वोट निरस्त हुआ। इस तरह वैध मतों के आधार पर रामावतार सैनी ने सभापति पद पर एक वोट से जीत दर्ज की। जिस एक-एक पार्षद को लेकर चुनाव से पहले इतनी राजनीतिक कवायद दिखाई दी, आखिरकार वही संख्या सभापति की कुर्सी का फैसला करने में निर्णायक साबित हुई।
तिजारा का यह घटनाक्रम स्थानीय निकाय चुनावों की उस हकीकत को भी सामने लाता है, जहां कई बार असली राजनीतिक मुकाबला मतदान केंद्र पर नहीं बल्कि मतदान से पहले शुरू हो जाता है। निर्वाचित पार्षदों की आवाजाही, उनके संपर्क में रहने वाले राजनीतिक दल, बाड़ेबंदी और अंतिम समय तक बदलते समीकरण अब निकाय राजनीति का हिस्सा बनते दिखाई देते हैं। लेकिन इस पूरे खेल के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल पार्षद की स्वतंत्रता का है।
यदि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को उसकी इच्छा के विरुद्ध मतदान से रोकने का प्रयास हुआ है तो यह गंभीर लोकतांत्रिक प्रश्न है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दूसरी ओर यदि लगाए गए आरोप राजनीतिक विवाद का हिस्सा मात्र थे तो उनकी वास्तविकता भी सामने आना जरूरी है। क्योंकि लोकतंत्र में सिर्फ मतदान का परिणाम महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि मतदाता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि बिना भय, दबाव या अवरोध के अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सके।
तिजारा में सभापति की कुर्सी का फैसला हो चुका है, लेकिन बस का टूटा हुआ शीशा अभी भी कई सवाल छोड़ गया है। सवाल यह नहीं कि किस पार्टी का प्रत्याशी जीता और किसका हारा, सवाल यह है कि क्या निकाय चुनाव में जनता के प्रतिनिधि तक पहुंचने वाला रास्ता भी उतना ही स्वतंत्र और सुरक्षित है, जितना संविधान मतदान के अधिकार को मानता है? तिजारा का घटनाक्रम इस सवाल का जवाब मांग रहा है और अब जवाब राजनीतिक बयानों से नहीं, बल्कि तथ्यों और निष्पक्ष जांच से सामने आना चाहिए।
सौजन्य से वीडियो रिपोर्ट राजस्थान
