MP में IAS नेहा मारव्या का तबादले के बाद तीखा बयान, बोलीं—‘जब अधीनस्थ ही तबादला करवा दें तो अधिकारी खुद को सुरक्षित कैसे समझे?’

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कार्यस्थल पर कथित दबाव और अनुशासनहीनता को लेकर उठाए गंभीर सवाल; टेबल पर हाथ पटकने से लेकर तबादले की धमकी तक का किया दावा, पोस्ट सामने आते ही प्रशासनिक गलियारों में बढ़ी हलचल

भोपाल। मध्यप्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था में एक वरिष्ठ IAS अधिकारी की सार्वजनिक टिप्पणी ने सत्ता और नौकरशाही के गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। 2011 बैच की IAS अधिकारी नेहा मारव्या ने अपने तबादले के बाद IAS एसोसिएशन के सोशल मीडिया मंच पर ऐसा पोस्ट साझा किया है, जिसमें उन्होंने कार्यस्थल पर कथित दबाव, अनुशासनहीनता और अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर बेहद गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका बयान ऐसे समय सामने आया है, जब राज्य सरकार ने उन्हें आदिम जाति विकास विभाग से हटाकर अजाक वित्त विकास निगम में नई जिम्मेदारी सौंपी है।मारव्या ने अपनी पोस्ट में जिस स्थिति का जिक्र किया है, वह महज व्यक्तिगत असंतोष तक सीमित नजर नहीं आती। उन्होंने अधीनस्थ स्तर पर कथित दबाव की बात उठाते हुए सवाल किया कि यदि किसी अधिकारी के मातहत काम करने वाले लोग ही उसके खिलाफ इस हद तक दबाव बना सकें कि उसका तबादला कराया जा सके, तो फिर प्रशासनिक अधिकारी अपने कार्यस्थल पर स्वयं को कितना सुरक्षित महसूस करेगा।

‘मेरी टेबल पर हाथ पटककर तबादले की धमकी दी’

IAS अधिकारी ने अपने पोस्ट में दावा किया कि उनके साथ काम करने वाले कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों का व्यवहार कथित तौर पर अनुशासन की सीमाओं को पार कर गया। उनके अनुसार विरोध करने वाले अधीनस्थों ने उनकी टेबल पर हाथ पटकने तक का व्यवहार किया और तबादला करवाने की धमकी दी।मारव्या का कहना है कि उन्होंने कथित दुर्व्यवहार, फाइलों को रोके जाने और कामकाज में पैदा की जा रही परेशानियों को लेकर शिकायतें भी कीं। उनके मुताबिक, शिकायतों पर कार्रवाई की अपेक्षा थी, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि अंततः तबादले का सामना उन्हें ही करना पड़ा।उनकी इसी शिकायत ने प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकारी और अधीनस्थ के बीच जवाबदेही की सीमा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

लगातार तबादलों ने बढ़ाई बेचैनी

नेहा मारव्या के हालिया प्रशासनिक रिकॉर्ड को देखें तो पिछले समय में उन्हें कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में बदलाव का सामना करना पड़ा है। डिंडौरी कलेक्टर के पद पर भी उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही बदलाव कर दिया गया था। इसके बाद आदिम जाति विकास विभाग में जिम्मेदारी मिली, लेकिन अब वहां से भी उन्हें हटाकर अजाक वित्त विकास निगम भेज दिया गया है।बार-बार जिम्मेदारी बदलने की इसी स्थिति पर उन्होंने अपने पोस्ट में असंतोष जाहिर किया है। उनका तर्क है कि किसी विभाग की कार्यप्रणाली समझने, व्यवस्था को पकड़ने और अपनी योजनाओं को जमीन पर उतारने का अवसर मिलने से पहले ही अधिकारी का स्थानांतरण हो जाए तो उससे प्रशासनिक निरंतरता भी प्रभावित होती है।

डिंडौरी से लेकर विभागीय जिम्मेदारी तक विवादों का साया

IAS नेहा मारव्या का नाम पिछले कुछ समय से प्रशासनिक हलकों में चर्चा में रहा है। डिंडौरी कलेक्टर रहते हुए भी उनके कार्यकाल से जुड़े कुछ स्थानीय विवाद सामने आए थे। बाद में उन्हें कलेक्टर पद से हटा दिया गया। हालांकि उन घटनाओं को लेकर अलग-अलग पक्षों की अलग-अलग व्याख्याएं रही हैं।आदिम जाति विकास विभाग में पदस्थापना के दौरान भी उनके कामकाज को लेकर मतभेद की खबरें सामने आती रही हैं। कुछ अधिकारियों-कर्मचारियों की ओर से उनके कार्यशैली को लेकर आपत्तियां सामने आने की चर्चाएं भी हुईं। हालांकि इन आरोपों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित सभी पक्षों का आधिकारिक पक्ष इस पूरे मामले को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

कर्मचारियों की सुविधाओं से लेकर वेतनवृद्धि तक उठे सवाल

मारव्या के विभागीय कार्यकाल को लेकर कर्मचारियों की सुविधाओं, विभागीय संसाधनों और वाहनों के इस्तेमाल सहित कई तरह के आरोप और चर्चाएं भी सामने आती रही हैं। कर्मचारियों की नियमित सुविधाओं पर कथित रोक और बड़ी संख्या में अधिकारियों-कर्मचारियों की वेतनवृद्धि से जुड़े मुद्दों को लेकर असंतोष की बातें भी मीडिया रिपोर्टों में सामने आईं।हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इन मामलों में संबंधित अधिकारी का पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ऐसे में इन आरोपों को अंतिम निष्कर्ष के बजाय विवाद और आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

अब सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी निगाहें

ताजा घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक वरिष्ठ IAS अधिकारी ने सार्वजनिक मंच पर अपने कार्यस्थल के अनुभवों और प्रशासनिक असुरक्षा को लेकर सवाल उठाए हैं। यह सामान्य तबादला आदेश से कहीं आगे जाकर प्रशासनिक कार्यसंस्कृति पर बहस खड़ी करता है।मारव्या के बयान ने सीधे तौर पर यह सवाल सामने रखा है कि क्या एक वरिष्ठ अधिकारी अपने ही अधीनस्थों के दबाव के बीच स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से काम कर सकता है? और यदि किसी अधिकारी की शिकायत का परिणाम उसके अपने तबादले के रूप में सामने आए तो प्रशासनिक तंत्र में शिकायत और जवाबदेही की व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम रहेगा?फिलहाल IAS नेहा मारव्या का यह बयान मध्यप्रदेश की नौकरशाही में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि राज्य सरकार या संबंधित विभाग उनके उठाए सवालों पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया देता है या नहीं।

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