सेवा-श्रमदान का आईना: समर्थक के कैमरे ने ही खोल दी ‘विकास’की पोल
अजमेर से आनासागर से सामने आई तस्वीर सिर्फ एक शहर की कहानी नहीं, बल्कि सत्ता और संगठन के लिए पूरे राजस्थान के लिए सबक है
अजमेर में बीजेपी के तीन दिवसीय आसानी सफाई आयोजन का समापन हुआ। कार्यकर्ता जुटे, नेता पहुंचे, श्रमदान हुआ और सेवा भी ,समर्थकों ने वीडियो कैमरों में कैद भी की । राजनीतिक आयोजनों में यह सब सामान्य है। लेकिन इस बार समर्थक के कैमरे ने कुछ ऐसा भी कैद कर लिया, जो शायद भाषणों और नारों के बीच दिखाई नहीं देना चाहिए था—आनासागर के पास गंदगी और नाले की यह वीडियो जो विकास के दावों पर खुद एक सवाल बन गई।
विडंबना यह है कि जिस आनासागर क्षेत्र को अजमेर की पहचान कहा जाता है, उसी क्षेत्र में सफाई अभियान के बीच गंदा नाला नजर आना अपने आप में एक राजनीतिक संदेश है। सवाल यह नहीं कि तीन दिन श्रमदान हुआ या नहीं। सवाल यह है कि जिस समस्या को लेकर वर्षों से जनता सवाल उठा रही है, वह समस्या आज भी वहीं क्यों खड़ी है?
आनासागर से जुड़ा वार्ड-71 राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण रहा है। वर्तमान बीजेपी अध्यक्ष रमेश सोनी पिछले नगर निगम बोर्ड में यहां से पार्षद रह चुके हैं। अब राजनीतिक जिम्मेदारियां बदल चुकी हैं, लेकिन जनता का सवाल वही है—आखिर जनप्रतिनिधित्व और संगठन की ताकत का वास्तविक लाभ जमीन पर जनता को कितना पहुंचा?
राजस्थान में बीजेपी की सरकार है। केन्द्र में बीजेपी की सरकार है। स्थानीय स्तर पर भी बीजेपी का राजनीतिक प्रभाव मजबूत है। यानी वह स्थिति जिसे राजनीतिक भाषा में ‘ट्रिपल इंजन सरकार’ कहा जाता है। जनता ने इस व्यवस्था पर भरोसा किया है और विकास की उम्मीदें लगाई हैं।
लेकिन राजनीति का असली चेहरा समर्थकों ने नाले के इस वीडियों से खोल दिया ।
अगर किसी शहर की ऐतिहासिक झील के आसपास गंदगी बनी रहे, नाले साफ न हों और अतिक्रमण का सवाल लगातार उठता रहे, तो फिर बड़े-बड़े विकास के दावे जनता के लिए सिर्फ इसी प्रकार के आयोजनों की भेंट चढ़ जाये हैं और भाषण बनकर रह जाते हैं।
और सबसे बड़ा राजनीतिक कटाक्ष तो यह है कि इस बार विपक्ष ने नहीं, बल्कि आयोजन में मौजूद समर्थकों के कैमरे ने ही सवाल खड़ा कर दिया।
नेताजी श्रमदान कर रहे थे, समर्थक उत्साह में वीडियो बना रहे थे और कैमरा घूमते-घूमते उस हकीकत तक पहुंच गया, जहां से सवाल उठना स्वाभाविक है—अगर अपने ही क्षेत्र की गंदगी कैमरे से नहीं छिपी, तो क्या जनता की आंखों से छिप पाएगी?
राजनीति में तस्वीरें बहुत कुछ कहती हैं। एक तस्वीर नेता की लोकप्रियता दिखाती है, दूसरी संगठन की ताकत और तीसरी तस्वीर व्यवस्था की सच्चाई।
यह वीडियो शायद तीसरी तस्वीर है।
यह किसी एक नेता या दल पर व्यक्तिगत हमला नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति पर सवाल है जिसमें श्रमदान की फोटो जल्दी वायरल हो जाती है, लेकिन नाले की सफाई की जिम्मेदारी वर्षों तक फाइलों में घूमती रहती है।
अजमेर की जनता यह भी जानना चाहती है कि आनासागर को अतिक्रमण से बचाने, नालों को साफ रखने और झील को प्रदूषण से बचाने के लिए जिम्मेदार संस्थाओं ने अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं। यदि काम हुआ है तो उसका परिणाम जमीन पर क्यों नहीं दिखता? और यदि नहीं हुआ तो उसकी जवाबदेही कौन लेगा?
राजनीति का सबसे बड़ा सबक यही है कि जनता को कैमरे के सामने श्रमदान से ज्यादा कैमरे के पीछे की सफाई चाहिए।
राजस्थान की राजनीति के लिए भी यह दृश्य एक चेतावनी है। सत्ता चाहे किसी की हो, संगठन चाहे कितना मजबूत हो और समर्थकों की भीड़ चाहे कितनी बड़ी हो—अगर जनता के सवाल वहीं खड़े हैं, तो भीड़ के बीच भी सवाल अकेला नहीं पड़ता।
अजमेर के आनासागर का यह गंदा नाला शायद सिर्फ एक नाला नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जिसमें नेताओं के हाथों में झाड़ू, तगारी तो दिखाई देती है, लेकिन व्यवस्था के हाथों में स्थायी समाधान कब आएगा—इसका जवाब अभी भी जनता तलाश रही है।
तीन दिन का श्रमदान समाप्त हो गया। कैमरे बंद हो गए। समर्थक लौट गए। आयोजन खत्म हो गया।
लेकिन आनासागर का नाला वहीं है।
और अब सवाल भी वहीं है—
क्या राजनीति सिर्फ श्रमदान की तस्वीर तक सीमित रहेगी, या कभी उस गंदे नाले की जिम्मेदारी भी तय होगी?
क्योंकि जनता अब सिर्फ यह नहीं देख रही कि नेता ने कितनी देर झाड़ू लगाई।
जनता यह भी देख रही है कि उसके बाद नाला साफ हुआ या नहीं।
यही फर्क है राजनीतिक प्रदर्शन और जनसेवा के बीच।
और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सबक भी है—
कैमरे को केवल नेता की ओर मत घुमाइए, कभी-कभी उसे उस नाले की ओर भी घुमा दीजिए, जहां से जनता की असली तस्वीर दिखाई देती है। – देवेन्द्र सक्सैना
