नईदिल्ली| (एजेंसी) मोटर दुर्घटना मुआवजे से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मुआवजे का निर्धारण केवल नीरस गणितीय आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि उसमें मानवीय पहलू को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने बीमा कंपनी की अपील खारिज करते हुए मृतक छात्र के माता-पिता को मिलने वाले मुआवजे में वृद्धि की।
मामला 11 जून 2013 को दिल्ली में हुए सड़क हादसे का है, जिसमें सीए फाइनल के 20 वर्षीय छात्र आकाश कुमार की मौत हो गई थी। आकाश अपने मित्र की कार में यात्रा कर रहे थे, तभी उनकी कार सड़क पर बिना पर्याप्त चेतावनी संकेतों के खड़े ट्रक से टकरा गई। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी) ने ट्रक चालक की लापरवाही मानते हुए 81.21 लाख रुपये का मुआवजा दिया था, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा।
यह भी पढ़ें:- खबर वन न्यूज

बीमा कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि दुर्घटना कार चालक की लापरवाही से हुई और मुआवजा मृतक के वास्तविक आर्टिकलशिप स्टाइपेंड के बजाय संभावित भविष्य की आय के आधार पर गलत तरीके से तय किया गया। वहीं, मृतक के माता-पिता ने मुआवजा बढ़ाने की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल पीछे से टक्कर होने से कार चालक को स्वतः दोषी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने माना कि ट्रक बिना लाइट या चेतावनी संकेतों के खड़ा था, जिससे दुर्घटना हुई। साथ ही, अदालत ने यह भी माना कि सीए फाइनल कर रहे छात्र की आय का आकलन केवल उसके तत्कालीन स्टाइपेंड से नहीं, बल्कि उसके संभावित पेशेवर करियर और भविष्य की कमाई को ध्यान में रखकर किया जाना उचित था।
हालांकि कोर्ट ने बिना दस्तावेजी साक्ष्य के प्राइवेट ट्यूशन या अन्य संभावित आय जोड़ने से इनकार किया, लेकिन माता-पिता को ‘फिलियल कंसोर्टियम’ (संतान के साहचर्य की हानि) के तहत 80,000 रुपये अतिरिक्त देने का आदेश दिया।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कुल मुआवजा 81.21 लाख रुपये से बढ़ाकर 82.01 लाख रुपये कर दिया और बीमा कंपनी को चार सप्ताह के भीतर बढ़ी हुई राशि जमा करने का निर्देश दिया।
यह भी पढ़ें:-

