अजमेर/ भोपाल/ रीवा (मध्य प्रदेश), 21 जून 2026।
सूचना का अधिकार (RTI) कानून को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की एक मौखिक टिप्पणी ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है। हरियाणा के एक सड़क निर्माण कार्य से जुड़े मामले में अग्रिम जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की युगल पीठ द्वारा की गई टिप्पणी कि “आरटीआई एक्टिविज्म एक नया बिजनेस बन गया है”! इसी मुद्दे पर आयोजित 313वें राष्ट्रीय आरटीआई वेबिनार में इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, आरटीआई विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे।
वेबिनार में वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट की उक्त टिप्पणी न्यायालय के अंतिम आदेश का हिस्सा नहीं है, बल्कि सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणी थी। इसके बावजूद इस टिप्पणी ने आरटीआई कानून, उसके प्रभाव और उसके कथित दुरुपयोग को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।
किसी विशेष मामले को पूरे आरटीआई आंदोलन से जोड़ना उचित नहीं : जस्टिस आदित्य नाथ मित्तल
इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस आदित्य नाथ मित्तल ने कहा कि किसी भी मामले पर राय बनाने से पहले उसके संपूर्ण तथ्यों को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह संभव है कि कुछ मामलों में आरटीआई या जनहित याचिकाओं का दुरुपयोग हुआ हो, लेकिन किसी एक मामले के आधार पर पूरे आरटीआई आंदोलन को संदेह के घेरे में रखना उचित नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि अग्रिम जमानत याचिका का खारिज होना कोई अंतिम निर्णय नहीं होता और यह न्यायालय के विवेकाधिकार का विषय है। इसलिए इस घटना को आरटीआई कानून की उपयोगिता अथवा उसके व्यापक प्रभाव से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
जजों को बयानबाजी से बचना चाहिए : जस्टिस कमलेश्वरनाथ
इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस कमलेश्वरनाथ ने कहा कि वर्तमान समय में न्यायालयों की सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियां अक्सर सुर्खियां बन जाती हैं, जिससे न्यायपालिका की गंभीरता और गरिमा पर अनावश्यक चर्चा शुरू हो जाती है।
उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों को अपने आदेशों और कानूनी तर्कों की शक्ति पर भरोसा करना चाहिए तथा अनावश्यक मौखिक टिप्पणियों से बचना चाहिए। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि देश में सड़क निर्माण सहित कई सार्वजनिक परियोजनाओं में गुणवत्ता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल हैं। ऐसे में नागरिकों को संविधान और आरटीआई कानून द्वारा दिए गए अधिकारों के तहत सवाल पूछने से नहीं रोका जा सकता।
उन्होंने कहा कि यदि जनप्रतिनिधि विकास कार्यों की निगरानी करने में विफल रहते हैं तो आम नागरिकों द्वारा जवाबदेही मांगना लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है।
भ्रष्टाचार उजागर करने का सशक्त माध्यम है आरटीआई : जस्टिस सुधीर सक्सेना
इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस सुधीर सक्सेना ने कहा कि आरटीआई कानून ने देश में पारदर्शिता बढ़ाने और अनेक भ्रष्टाचार मामलों को उजागर करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।
उन्होंने चिंता जताई कि कई मामलों में भ्रष्टाचार उजागर होने के बाद भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती। उन्होंने कहा कि कुछ अपवादों के आधार पर सभी आरटीआई कार्यकर्ताओं को ब्लैकमेलर कहना न केवल अनुचित है बल्कि उन लोगों के योगदान को भी नजरअंदाज करना है जिन्होंने वर्षों से व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए संघर्ष किया है।
यह भी पढ़ें:-
आरटीआई कार्यकर्ताओं का जीवन आसान नहीं : संतोष राठौर
गुजरात के सामाजिक कार्यकर्ता संतोष कुमार राठौर ने कहा कि धरातल पर आरटीआई कार्यकर्ताओं को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार जानकारी प्राप्त करने के लिए वर्षों तक विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, अपील और शिकायतें करनी पड़ती हैं तथा न्यायालयों तक जाना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि आरटीआई एक्टिविज्म को व्यवसाय बताना उन हजारों लोगों के संघर्ष का अपमान है जो व्यक्तिगत लाभ के बजाय सार्वजनिक हित के लिए काम कर रहे हैं।
आरटीआई ने देश के बड़े-बड़े भ्रष्टाचार उजागर किए : वीरेंद्र ठक्कर
उत्तराखंड के आरटीआई रिसोर्स पर्सन और प्रोफेसर वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से आरटीआई कानून के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि देश के अनेक चर्चित घोटाले और भ्रष्टाचार के मामले आरटीआई के माध्यम से ही सामने आए हैं।
उन्होंने कहा कि आज तक किसी भी न्यायालय ने यह सिद्ध नहीं किया है कि केवल आरटीआई आवेदन लगाने के कारण किसी व्यक्ति ने ब्लैकमेलिंग की हो। उन्होंने इसे एक धारणा और पूर्वाग्रह बताया, जिसे तथ्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए।
न्यायपालिका की हर टिप्पणी का व्यापक प्रभाव पड़ता है : प्रवीण पटेल
फोरम फॉर फास्ट जस्टिस एवं सोसायटी फॉर फेडरेशन ऑफ फास्ट जस्टिस के संयोजक प्रवीण पटेल ने कहा कि न्यायपालिका देश की सबसे विश्वसनीय संस्थाओं में से एक है। इसलिए न्यायाधीशों द्वारा की गई प्रत्येक टिप्पणी का सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा कि नेताओं और अधिकारियों की तुलना में न्यायपालिका के शब्दों को अधिक गंभीरता से लिया जाता है, इसलिए न्यायालयों को सार्वजनिक टिप्पणियों में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
देशभर के कार्यकर्ताओं ने लिया हिस्सा
वेबिनार का संचालन आरटीआई एवं सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने किया। कार्यक्रम में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, उत्तराखंड और अन्य राज्यों के अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं, आरटीआई विशेषज्ञों और नागरिक अधिकार समूहों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने आरटीआई कानून को लोकतंत्र की जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला महत्वपूर्ण उपकरण बताते हुए इसके संरक्षण और प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया।
313वें राष्ट्रीय आरटीआई वेबिनार का सार यही रहा कि सूचना का अधिकार कानून लोकतंत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और जनभागीदारी का एक सशक्त माध्यम है। वक्ताओं ने माना कि किसी भी कानून के सीमित दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन उसके आधार पर पूरे आंदोलन या लाखों जागरूक नागरिकों की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगाना उचित नहीं होगा। साथ ही न्यायपालिका, प्रशासन और नागरिक समाज— तीनों को लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है।
