नईदिल्ली / पटना | बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में 17 जून 2026 को हुई भरत भूषण तिवारी की मौत अब केवल एक पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गई है। यह घटना कानून, मानवाधिकार, पुलिस जवाबदेही और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है। पूरे बिहार में इस मामले को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है और सरकार को न्यायिक जांच के आदेश तक देने पड़े हैं।
क्या हुआ था?
पुलिस के अनुसार भरत तिवारी के पास अवैध हथियार थे और कार्रवाई के दौरान उसने पुलिस टीम पर हमला या फायरिंग करने की कोशिश की। जवाबी कार्रवाई में उसे गोली लगी और बाद में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष इससे बिल्कुल अलग है।
घटना का एक वीडियो सामने आया, जिसमें भरत तिवारी पुलिस के सामने दिखाई देता है। वीडियो वायरल होने के बाद सवाल उठे कि क्या वह आत्मसमर्पण की स्थिति में था? यदि हां, तो फिर गोली चलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसी बिंदु ने पूरे मामले को कथित “फर्जी एनकाउंटर” की बहस में बदल दिया।
गांव का युवक या अपराधी?
स्थानीय लोगों और परिजनों का दावा है कि भरत तिवारी गांव के लोगों के हक और स्थानीय मुद्दों को उठाने वाला युवक था। कुछ रिपोर्टों में उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ भी बताया गया है। दूसरी ओर पुलिस का पक्ष है कि वह हथियारबंद था और पुलिस के लिए खतरा बन चुका था। यही विरोधाभास जांच का सबसे महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
मौत के बाद फूटा जनाक्रोश
भरत तिवारी की मौत के बाद ग्रामीणों ने सड़क जाम कर विरोध प्रदर्शन किया। लोगों का आरोप था कि यदि किसी व्यक्ति ने अपराध किया भी हो, तो उसे अदालत में पेश किया जाना चाहिए था, न कि गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया जाए। विरोध इतना बढ़ा कि मामला राज्यव्यापी चर्चा का विषय बन गया।
पुलिस पर कार्रवाई
विवाद बढ़ने के बाद शाहपुर थाना प्रभारी राजेश मालाकार सहित कई पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया। बाद में थाना प्रभारी का एक विवादित बयान भी सामने आया, जिसने जनता के आक्रोश को और बढ़ा दिया।
सरकार को क्यों झुकना पड़ा?
मामले ने ऐसा राजनीतिक रूप लिया कि सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ओर से सवाल उठने लगे। बढ़ते दबाव के बीच बिहार सरकार ने न्यायिक जांच के आदेश दिए। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन पाया गया तो कार्रवाई की जाएगी।
सबसे बड़ा सवाल
भारत के कानून में अपराधी को सजा देने का अधिकार अदालत को है, पुलिस को नहीं। यदि भरत तिवारी ने पुलिस पर हमला किया था तो कार्रवाई उचित थी या नहीं, इसका फैसला जांच करेगी। लेकिन यदि वह आत्मसमर्पण की स्थिति में था और उसके बाद गोली चली, तो यह मामला बेहद गंभीर माना जाएगा। यही कारण है कि पूर्व पुलिस अधिकारियों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक नेताओं ने भी निष्पक्ष जांच की मांग की है।
भरत तिवारी एनकाउंटर आज बिहार की राजनीति का सबसे चर्चित मुद्दा बन चुका है। एक ओर पुलिस का दावा है कि उसने कानून के तहत कार्रवाई की, दूसरी ओर वीडियो, परिजनों के आरोप और जनता का गुस्सा इस दावे पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। सच क्या है, इसका अंतिम उत्तर न्यायिक जांच ही दे सकेगी।
लेकिन इस घटना ने एक बार फिर देश के युवाओं के सामने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि लोकतंत्र में न्याय का रास्ता अदालत से होकर जाएगा या बंदूक की नली से?
जब तक जांच पूरी नहीं होती, भरत तिवारी केवल एक नाम नहीं, बल्कि न्याय और जवाबदेही की परीक्षा बन चुके हैं।
