जंतर-मंतर से उठी हुंकार: “कॉकरोच” कहे गए युवाओं ने सत्ता से मांगा जवाब

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पेपर लीक, बेरोजगारी और भविष्य की चिंता को लेकर दिल्ली में उमड़ा जनसैलाब

अभिजीत दीपके बोले “यह सिर्फ ट्रेलर है”

नई दिल्ली(मीडिया न्यूज) दिल्ली का जंतर-मंतर शनिवार को करोड़ों युवाओं की बेचैनी, गुस्से और उम्मीदों का प्रतीक बन गया। 

सोशल मीडिया पर शुरू हुआ “कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)” का आंदोलन पहली बार सड़कों पर उतरा और हजारों छात्र, प्रतियोगी परीक्षा अभ्यर्थी तथा युवा रोजगार और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग को लेकर एकत्र हुए।

अमेरिका से लौटे आंदोलन के संस्थापक अभिजीत दीपके सुबह दिल्ली पहुंचे। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही समर्थकों ने उनका स्वागत किया। हाथ में संविधान की प्रति और चेहरे पर दृढ़ता लिए दीपके सीधे आंदोलन के केंद्र जंतर-मंतर पहुंचे, जहां पहले से ही युवाओं की भीड़ उनका इंतजार कर रही थी।

फूल, तिरंगा और किताबें: विरोध का अनोखा अंदाज

आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता इसका शांतिपूर्ण स्वरूप रहा। आयोजकों ने प्रदर्शनकारियों से तिरंगा, संविधान और पुस्तकें लेकर आने की अपील की थी। कई युवाओं ने पुलिसकर्मियों को फूल भेंट किए। संदेश साफ था— संघर्ष होगा, लेकिन लोकतंत्र और संविधान की मर्यादा में।

मंच से क्या बोले अभिजीत दीपके?

अपने संबोधन में अभिजीत दीपके ने कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही के लिए है। उन्होंने युवाओं से कहा कि अगर उनकी आवाज सोशल मीडिया से हटाई भी जाएगी तो भी उनकी मांगें खत्म नहीं होंगी।

उन्होंने कहा कि वे इस लड़ाई के लिए अपनी स्वतंत्रता तक कुर्बान करने को तैयार हैं। प्रदर्शन के अंत में उन्होंने घोषणा की कि यह आंदोलन यहीं समाप्त नहीं होगा और “आज का प्रदर्शन केवल ट्रेलर है, पूरी फिल्म अभी बाकी है।”

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कौन-कौन मंच पर दिखा?

आंदोलन को सामाजिक कार्यकर्ता Sonam Wangchuk का समर्थन मिला। उन्होंने इसे लोकतंत्र में युवाओं की भागीदारी का सकारात्मक संकेत बताया। वहीं विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं ने भी आंदोलन के प्रति सहानुभूति जताई।

मंच से बार-बार पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताएं, रोजगार संकट और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठती रही। प्रदर्शनकारियों ने “हम डरेंगे नहीं” और “जवाब दो” जैसे नारे लगाए।

पांच प्रमुख मांगें

भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता।

पेपर लीक मामलों की जवाबदेही तय हो।

शिक्षा व्यवस्था में सुधार।

युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री से नैतिक जिम्मेदारी लेने की मांग।

राजनीति के लिए चेतावनी या अवसर?

भारतीय राजनीति लंबे समय से जाति, धर्म और क्षेत्रीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन जंतर-मंतर का यह दृश्य संकेत देता है कि आने वाले समय में बेरोजगारी, शिक्षा और अवसरों की समानता जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ सकते हैं।

हजारों युवाओं का बिना किसी पारंपरिक राजनीतिक संगठन के एक मंच पर जुटना यह दर्शाता है कि देश का युवा अब केवल चुनावी वादे नहीं, बल्कि परिणाम चाहता है। यदि यह ऊर्जा संगठित दिशा लेती है तो आने वाले वर्षों में यह आंदोलन भारतीय राजनीति की दिशा प्रभावित कर सकता है।

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आखिरी संदेश

शाम ढलने लगी तो भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी। कोई हिंसा नहीं हुई, कोई बड़ा टकराव नहीं हुआ। मंच से आखिरी संदेश यही था कि लड़ाई लंबी है और संघर्ष जारी रहेगा। इसके बाद अभिजीत दीपके अपने माता-पिता से मिलने रवाना हो गए, जिन्हें उन्होंने पिछले एक वर्ष से नहीं देखा था।

जंतर-मंतर से निकला सबसे बड़ा संदेश यही था कि भारत का युवा अब केवल सुनने के लिए तैयार नहीं है, वह सुना भी जाए चाहता है ।

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