“क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध बनता जा रहा है?”
रीवा, मध्यप्रदेश | स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट
आरटीआई रिवॉल्यूशनरी ग्रुप इंडिया, फोरम फॉर फास्ट जस्टिस एवं मिशन फ्री लीगल एजुकेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 308वें राष्ट्रीय ऑनलाइन वेबीनार में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत द्वारा मीडिया और आरटीआई कार्यकर्ताओं को “काकरोच” और “पैरासाइट” कहे जाने वाले बयान पर तीखी चर्चा हुई।
कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी ने किया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुधीर कुमार सक्सेना ने कहा कि आरटीआई ने कई बड़े भ्रष्टाचार उजागर किए हैं, लेकिन न्यायपालिका में लंबित मामलों, भ्रष्टाचार और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले अधिवक्ताओं पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है। उन्होंने ऐसे मामलों के लिए विशेष न्यायालय बनाने की मांग रखी।
सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राजीव लोचन मेहरोत्रा ने कहा कि सोशल मीडिया और आरटीआई लोकतंत्र में जनता की आवाज हैं। आलोचना को विरोध मानना लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर कर सकता है।
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फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के प्रवीण पटेल ने कहा कि सूचना का अधिकार लागू होने के बावजूद जानकारी प्राप्त करना आज भी कठिन है। कई विभाग सूचना देने से बचते हैं और अदालतों में वर्षों तक मामले लंबित रहते हैं।
पूर्व सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने कहा कि मीडिया और आरटीआई कार्यकर्ताओं के लिए “परजीवी” जैसे शब्द लोकतंत्र को कमजोर करने वाले हैं। उन्होंने न्यायपालिका और प्रशासन में जवाबदेही तय करने की आवश्यकता बताई।
आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने कहा कि सूचना आयोग केवल सूचना उपलब्ध कराने, जुर्माना लगाने और अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश तक सीमित है। उन्होंने डिजिटल मीडिया, आरटीआई और न्यायिक स्वतंत्रता पर प्रस्तुतीकरण देते हुए कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने जनता की आवाज को मजबूत किया है, लेकिन गलत सूचना और संस्थागत विश्वसनीयता जैसी चुनौतियां भी बढ़ी हैं।
आरटीआई कार्यकर्ता हरीश सोलंकी ने जेलों की खराब स्थिति, पुलिस प्रताड़ना और न्यायिक उत्पीड़न के अपने अनुभव साझा किए। वहीं झारखंड के जीवन कुमार ने झूठी प्राथमिकी और पुलिस द्वारा कार्रवाई नहीं करने का मुद्दा उठाया।
वेबीनार में वक्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र में मीडिया, न्यायपालिका और नागरिक समाज के बीच संतुलित संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखना जरूरी है।
