अजमेर में “विकास” पानी-पानी: वार्ड 52 में वार्ड सभा बनी मज़ाक, जनता का फूटा गुस्सा

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मुख्यमंत्री विकसित शहर की,जमीनी हकीकत

अजमेर। मुख्यमंत्री “विकसित शहर” अभियान के दावों की पोल खुलकर सामने आने लगी है। अजमेर के वार्ड 52 में आयोजित वार्ड सभा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कागजों में चमकता विकास ज़मीनी हकीकत में बदहाल व्यवस्था में तब्दील हो चुका है।

मुख्यमंत्री विकसित शहर अभियान के तहत बुलाई गई इस वार्ड सभा में हालात इतने विडंबनापूर्ण रहे कि जिन अधिकारियों को जनता की समस्याएं सुननी थीं, वे खुद ही नदारद रहे। रात 9 बजे फोन कर बताया गया ,सुबह 8 बजे बैठक में बुलाया गया, लेकिन 9.15 बजे तक भी जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचे। सवाल उठता है—क्या यही “विकास” का नया मॉडल है, जहां जनता इंतजार करे और सिस्टम गायब रहे?

जलभराव बना सबसे बड़ा जख्म

स्थानीय निवासी नरेश ने साफ कहा कि हल्की सी बारिश में ही वार्ड की गलियां तालाब बन जाती हैं। घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। नालियों की सफाई नियमित नहीं होती—फोन करो तो काम होता है, वरना हालात जस के तस। यह स्थिति बताती है कि शहर की सबसे बुनियादी समस्या—जल निकासी—आज भी बदहाल है।

वैशाली नगर और उसके आसपास के इलाकों में अवैध कब्जों और निर्माणों ने प्राकृतिक जल निकासी को बुरी तरह प्रभावित किया है। बताया जा रहा है कि आनासागर की गहराई 19 फीट से घटकर करीब 11 फीट रह गई है, जिसका सीधा असर यह है कि बारिश का पानी अब निचले इलाकों के घरों में घुस रहा है। यानी “विकास” ने राहत नहीं, नई मुसीबतें पैदा की हैं।

व्यवस्था का दुरुपयोग मजाक

स्थानीय निवासी सुंदर सिंह ने आरोप लगाया कि वार्ड की समस्याओं के समाधान के नाम पर जमादार के साथ टीम भेजी गई, जबकि बैठक में उनकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी। इससे साफ है कि निगम में न तो योजना है, न समन्वय—सिर्फ खानापूर्ति चल रही है।

तकनीकी अक्षमता या दबाव?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि अजमेर में या तो तकनीकी जानकार अधिकारियों की भारी कमी है, या फिर उन पर भू माफियाओं का किसी प्रकार का दबाव है। नतीजा यह है कि जो क्षेत्र विकसित होने चाहिए, वे “डूब क्षेत्र” बनते जा रहे हैं। तुलना में कोटा, जयपुर, उदयपुर और जोधपुर जैसे शहरों में हुए विकास कार्य आज भी मिसाल माने जाते हैं—लेकिन अजमेर में हालात उलट नजर आते हैं।

नेतृत्व पर भी सवाल

हैरानी की बात यह है कि यह क्षेत्र अजमेर के उत्तर विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है, इसके बावजूद बुनियादी समस्याएं दशकों से जस की तस हैं। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या स्थानीय नेतृत्व और प्रशासन के बीच समन्वय पूरी तरह खत्म हो चुका है?

वीडियो देखें:

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जनता का सीधा सवाल

जनता पूछ रही है— क्या “विकास” का मतलब सिर्फ योजनाओं के नाम पर कागजी खानापूर्ति है?
क्या नगर निगम अब सिर्फ ठेकेदारों का प्रबंधन केंद्र बनकर रह गया है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या अजमेर में “विकास” सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेगा?

👉 अब नजर इस बात पर है कि मुख्यमंत्री इस लापरवाही को कितना गंभीरता से लेते हैं। क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या फिर हमेशा की तरह ढोल-नगाड़ों में ही “विकास” का शोर दबा दिया जाएगा?

स्थानीय निवासी ने बताया कि अजमेर में नेताओं द्वारा विकास के दावे जितने ऊंचे किए जाते थे, उतनी ही ऊंचाई से निगम ने उन्हें धराशाई करवाने में कोई कमी नहीं रखी सेवन वंडर, फ़ूडकोर्ट उदाहरण है। हालांकि कहने को अजमेर का यह क्षेत्र राजस्थान के विधानसभा अध्यक्ष की कर्म-भूमि है,जिसे उनके कार्यकाल में ही अधिकारी भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ाते जा रहे । लेकिन किसी अधिकारी पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं होती ?

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