👉 सुप्रीम कोर्ट का करारा तमाचा: झूठी FIR पर रोक, लेकिन सरकार की चुप्पी पर उठे सवाल
👉 पत्रकारों पर फर्जी मुकदमों का सिलसिला कब रुकेगा? जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
नई दिल्ली/जयपुर।
सुप्रीम कोर्ट ने Zee मीडिया विवाद में आशीष दवे के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करते हुए एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि अस्पष्ट, अनुमानित और बिना तथ्यों के आरोपों पर आपराधिक कार्रवाई कानून का दुरुपयोग है। कोर्ट ने न सिर्फ FIR को खारिज किया, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली और प्रभावशाली संस्थाओं के दबाव में की गई कार्रवाई पर भी तीखी टिप्पणी की।
लेकिन इस फैसले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर पिछले पांच वर्षों में पत्रकारों पर दर्ज हुए झूठे मुकदमों का हिसाब कौन देगा?
बीते कुछ वर्षों में देशभर में कई पत्रकारों पर बिना ठोस सबूत के FIR दर्ज की गईं। कहीं सत्ता के दबाव में, तो कहीं प्रभावशाली लोगों के इशारे पर। कुछ मामलों में दबाव बनाकर समझौते करवा लिए गए, तो कई पत्रकार ऐसे भी रहे जिनकी जिंदगी, करियर और परिवार तक बर्बाद हो गए।
सवाल यह है कि जब अदालतें बार-बार ऐसी FIR को झूठा, बेबुनियाद और कानून का दुरुपयोग बताकर खारिज कर रही हैं, तो—
👉 क्या सरकार ने कभी उन लोगों पर कार्रवाई की जिन्होंने झूठी शिकायतें की?
👉 क्या पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई जिन्होंने बिना जांच के FIR दर्ज की?
👉 क्या झूठी गवाही देने वालों पर कोई कानूनी शिकंजा कसा गया?
जवाब आज भी “नहीं” में है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि ऐसे मामलों में प्रारंभिक जांच अनिवार्य होनी चाहिए, ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति को बेवजह आपराधिक प्रक्रिया में न घसीटा जाए। फिर भी हकीकत यह है कि पत्रकारों के खिलाफ FIR दर्ज करना आज एक आसान हथियार बनता जा रहा है—जिसका इस्तेमाल सच को दबाने और आवाज़ों को कुचलने के लिए किया जा रहा है।
यह सिर्फ किसी एक पत्रकार या एक मामले की बात नहीं है, बल्कि यह पूरी पत्रकारिता पर किया जा रहा अतिक्रमण है। जब बिना तथ्यों के मुकदमे दर्ज होंगे, तो न सिर्फ पत्रकार डरेंगे बल्कि लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी—स्वतंत्र मीडिया—कमजोर होगी।
संपादकीय पढ़ें:
वरिष्ठ पत्रकारों की राय:
वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि अब समय आ गया है जब सरकारों को सिर्फ अदालतों के फैसलों का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि—
✔️ झूठी FIR दर्ज कराने वालों पर सख्त कार्रवाई हो
✔️ बिना जांच FIR दर्ज करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय हो
✔️ पत्रकारों को कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाए
सरकार को संदेश:
जब तक झूठे आरोप लगाने वाले और झूठी गवाही देने वाले बेखौफ रहेंगे, तब तक निर्दोष लोग ही न्याय के नाम पर सजा भुगतते रहेंगे।
सरकारों को यह समझना होगा कि पत्रकारिता को दबाने की कोशिशें अंततः लोकतंत्र को ही कमजोर करती हैं।
अब वक्त है—सिर्फ फैसले नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का।

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