अजमेर । राजनीति इन दिनों किसी गंभीर जनसंघर्ष की नहीं, बल्कि एक ऐसे झुनझुने की गूंज बन चुकी है, जिसे कांग्रेस पूरे उत्साह से बजाती रही है। मुद्दा कोई भी हो — नाम बदलने का, बोर्ड लगाने का या पोस्टर उतारने का — कांग्रेस उसे जनता की लड़ाई बताने में देर नहीं लगाती, भले ही जनता उस शोर को सुनकर भी अनसुना कर दे।
मनरेगा का नाम बदलने पर अजमेर में जिस तरह से धरना-प्रदर्शन की तैयारियां की जा रही हैं, उससे ज्यादा चर्चा नेताओं की सूची की हो रही है, मुद्दे की नहीं। बैठकें हो रही हैं, जिम्मेदारियां बांटी जा रही हैं, कैमरे सेट हो रहे हैं — लेकिन सवाल यह है कि अजमेर की जनता को इससे क्या मिलने वाला है?
अजमेर के कांग्रेस नेता, बीजेपी की राजनीति को शायद समझ ना पाएं कि अब राजनीति पकड़म-पकड़ाई से आगे निकल चुकी है। बीजेपी जब कोई फैसला लेती है तो उसे पूरा करती है ,उसे ही कांग्रेस पकड़ लेती है, और फिर उसे इतने दिन तक बजाती रहती है कि जनता ऊब कर दूसरी तरफ देखने लगती है। बीजेपी अपना काम करती रहती है ।
कुछ समय पहले तक अजमेर में भी “वोट चोरी” का शोर था। दिल्ली की रैली के लिए जमीन तैयार की जा रही थी, बिहार चुनाव से पहले से स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी थी। लेकिन जैसे ही जनता को यह समझ आया कि वोट चोरी नहीं, बल्कि वर्षों की सिस्टम की गड़बड़ियों और गलत एंट्रियों में सुधार हो रहा है तब से कांग्रेसियों के मुंह से नारे बदल गए।
अब जैसे ही बीजेपी ने मनरेगा की खामियों को सुधारने की बात करते हुए नामकरण का ऐलान किया, अजमेर कांग्रेस ने राहत की सांस ली — चलो नया मुद्दा मिल गया!
नाम बदलने को रोजगार से जोड़कर पेश किया जा रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि अजमेर का मजदूर नाम से नहीं, काम के दिनों से मतलब रखता है। बीजेपी ज्यादा दिन काम देने की बात कर रही है और कांग्रेस नाम पर आंदोलन कर रही है।
अजमेर की कांग्रेस: माला, माइक और मौन
अजमेर की राजनीति की सबसे दिलचस्प तस्वीर यह है कि जो नेता चुनावों में दम भरते थे, वे नए चेहरे आते ही अचानक “मार्गदर्शक मंडल” में पहुंच गए।
कई पूर्व विधायक, पूर्व नेता और चुनावी दिग्गज अब या तो घरों में बैठकर राजनीति देख रहे हैं, या फिर सिर्फ माला पहनने और मंच साझा करने बाहर निकलते हैं।
जनता के बीच जाने की ताकत, भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने का साहस और सत्ता से सवाल पूछने की भूख — यह सब अजमेर की कांग्रेस से धीरे-धीरे गायब हो चुका है।
कभी-कभार सड़कों पर उतरकर मुद्दे उठाए भी जाते हैं, तो उन्हें इस वादे के साथ टाल दिया जाता है कि हमारी “सरकार बनेगी तो सब ठीक कर देंगे।”
यानि आज संघर्ष नहीं, आज जवाबदेही नहीं — सब कुछ भविष्य के भरोसे।
जनता सब देख रही है
अजमेर की जनता अब यह समझ चुकी है कि हर शोर आंदोलन नहीं होता और हर धरना जनहित नहीं।
स्थानीय दल समाज विशेष या जमीन विवादों को भुनाने में लगे हैं, कांग्रेस नामकरण के झुनझुने में उलझी है और बीजेपी काम के साथ राजनीति कर रही है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल अजमेर की सड़कों पर खड़ा है
असली पीड़ित जनता की आवाज आखिर उठाएगा कौन?
आने वाले नगर निगम चुनाव इस सवाल का जवाब देंगे। और अगर संकेतों को समझा जाए, तो अजमेर की राजनीति में कांग्रेस के झुनझुने की आवाज अब धीमी नहीं, बल्कि बेसुरी होती जा रही है।
