नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक आदेश जारी करते हुए अपने ही 16 मई 2025 के फैसले को वापस ले लिया, जिसमें एक्स-पोस्ट-फैक्टो (बाद में दी गई) पर्यावरण अनुमति को अवैध ठहराया गया था। इस फैसले से कई राष्ट्रीय परियोजनाओं के रुकने और गिराए जाने का खतरा था।
इस ताज़ा आदेश से लगभग 20,000 करोड़ रुपये की उन निर्माण परियोजनाओं को राहत मिली है, जिनका काम पर्यावरण अनुमति विवाद के कारण अटक गया था। इनमें ओडिशा में बन रहा नया AIIMS कैंपस, कर्नाटक का विजयनगर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, और कई महत्वपूर्ण कॉमन इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट्स (CETPs) शामिल हैं।
तीन-न्यायाधीशों की बेंच ने यह निर्णय बहुमत (2-1) से सुनाया। चीफ जस्टिस बी.आर. गवैया और जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने फैसले का समर्थन किया, जबकि जस्टिस उज्जल भूय्यन ने असहमति जताई।
कोर्ट ने माना कि पुराने आदेश को लागू रखने से पहले बड़े सार्वजनिक निर्माणों को ध्वस्त करना पड़ सकता था, जिससे जनता के हित को नुकसान और सरकारी धन की भारी बर्बादी होती। अदालत ने कहा कि यह स्थिति “जनहित के मूल सिद्धांत के खिलाफ” होती।
पूर्व निर्णय में कोर्ट ने कहा था कि पूर्व-स्वीकृति (prior approval) ही पर्यावरण कानून का मूल नियम है, और किसी निर्माण के शुरू होने के बाद अनुमति देना अवैध है। लेकिन सरकार ने इस निर्णय पर पुनर्विचार याचिकाएँ दाखिल कर दलील दी कि इससे पूरे देश में विकास कार्य ठप पड़ जाएंगे।
अब सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि 2017 की पर्यावरण मंत्रालय की नोटिफिकेशन और 2021 का ऑफिस मेमोरेंडम के तहत अनुमति देते समय जुर्माना व दंड की व्यवस्था है, और इसे अवैध नहीं कहा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि “जनहित और कानून के संतुलन की रक्षा आवश्यक है।”
हालांकि, जस्टिस भूय्यन ने अपनी असहमति में कहा कि “पर्यावरण सुरक्षा के मामले में ढील राष्ट्रीय हित को भी नुकसान पहुँचा सकती है”—यानी कानूनी बहस आगे भी जारी रह सकती है।
सरकारी अधिकारियों ने इस निर्णय का स्वागत किया है और कहा कि अटके हुए राष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स अब गति पकड़ेंगे, वहीं पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेताया कि इस ढिलाई से कानून के दुरुपयोग की आशंका भी बढ़ेगी।
